Skip to main content

मंज़िल ना मिली



ज़िन्दगी जब भी जैसी भी रही
उसी के क़ायदे कानूनों  में ढ़ली

वक़्त का तक़ाज़ा करती ही रही 
ढलती शाम टूटे जाम सी  मिली 

सफऱ में बहुत दूर हमें जाना था
रास्तों में कब अपना ठिकाना था

हर मोड़ पर बस वायदे सी मिली
ज़िन्दगी तू हमें क्यों देर से मिली

रास्तों के बाद बस रास्ते ही मिले
मकां मिला ना हमें मंज़िल ही मिली
आराधना राय

Comments

Popular posts from this blog

कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"