Skip to main content

निभाया था

अपनों ने जब कोई मुझ से रिश्ता ना निभाया था
तो उसी ने आकर गम कुछ इस तरह बटाया था

मुझे  नहीं उसने मेरे ज़ख्मों को गले लगाया था 
कौन कहता है उस रोज़ वो कुछ भी ना लाया था

वो किस तकलीफ़ में था ये बात कह ना पाया था
दिल कि हज़ार खुशियाँ वो मुझे ही  देने आया था

मेरे मकान के दरों -दीवार कब से यू ही ढह रहे थे
वो मेरा टूटा हुआ घर फिर बनाने ही तो आया था

सरे बाज़ार वो मुझ से कुछ भी तो कह ना सका था
वो मेरे दामन को कीचड़  से ही  बचाने तो आया था
  
आराधना राय

Comments

Popular posts from this blog

कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"