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बता जाती है

बता जाती है
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बात दिल को छू कर यू  चली जाती है
ज़िंदगी अपनी  कीमत ही बता जाती है
दुनियाँ में  हर शए ही बिकने  जाती है
गर सही कीमत कहीं उसे मिलजाती है

दफ़न , कफ़न , भी जो लोग नहीं पाते है
उनके हिस्सें में बस सिक्के नहींआते है
अस्मत से  किस्मत तक खरीद जाते है
खनकते सिक्कों को खुदा भी कह जाते है

दिल कि उम्मीद पर जीवन जो बिताते है
उनकी क़ीमत तो खुदा भी नहीं लगते है
चाँद तारे भी सामने  मंद से  पड़ जाते है
वो  ही सूरज बन दुनियाँ को  चमकाते है 
आराधना राय 


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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))