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नज़्म -------------तेरे ख़त





आभार गुगल इमेज़


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   तेरे ख़त मुझे आज भी  क्यू  देर तक यू रुलाते है  
 यादों कि कैद में थमीं बातों में  जब मुस्कुराते है 

धुँधले हो चुके स्याह शब्द  कुछ कह से जाते है  
 आँसुओ  के धब्बों में छिपे राज़ हरे से हो जाते है 

  वक़्त के मोड़ पर खड़े यू ही जब कहीं ठहर जाते है  
 उनकी बातों के सायों को इंतज़ार  में खड़े पाते  है 

 कागज़  ना दवात कलम लिखने वाले लिख जाते है  
बातों के अहसास अब किसी के समझ नहीं आते है  

किसी के ऑंसू भी कोई दास्तां नहीं सुना कर  जाते है 
दर्द दिल के दिल में ही दफन से हो कर क्यू रह जाते है 


  आराधना राय  

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"