Skip to main content

Posts

तलबगार

       ताक़त-ए-बेदाद-ए-इंतिज़ार नहीं है        हम सा  कोई तेरा  तलबगार नहीं है           हयात-ए-दहर कि वफा पहले दिखाइए          दिल मेरा उन अब तलक बेज़ार नहीं है            क़त्ल का उसने मेरे इंतज़ाम  ऐसा किया            वो जानता था दिल मेरा उस्तुवार नहीं है                      मेरा दिल दिल ना था क्यों बेदर्द सा हुआ               अब लोगों कि बातों पे मुझे एतबार नहीं है                माना के रोने पे  मेरा इख्तिआर नहीं है            अब उसको मेरा पहले सा इंतज़ार नहीं है              कहते है सितमगार मुझे लोग कुछ "अरु"                 उनके दिलों में अब बच...

ख़्वाहिशें

उन से मिलने की ख़्वाहिशें हज़ार की दिल ने मिल कर साज़िशें हज़ार की ना जाने कारवां किधर जा रहा था सबने आरइशे हज़ार की अपनी ही मस्ती में सब डूबे हुए थे बस्तियों में रिहाइशें हज़ार की साथी अजब से राह में मिल रहे थे सबने सिफारिशें हज़ार की सफर रास्तों के ना आसान होंगे कहने को "अरु" ख़्वाहिशें हज़ार की آرادنا رائے ار

ईद -

                             ईद ईद से खूबसूरत कहाँ कोई बात होती है ईद के चाँद में अक्सर कोई बात होती है रुखसत हुई हो डोली में दुल्हन ही आज इज़्ज़त से जो हो जाए वहीं बात होती है बारात सज रही है अर्श पे लगता है आज हिल - मिल कर ही दिल से बात होती है रब के होने का अहसास जगाता है  चाँद जब भी मिलती है रूहानी सी बात होती है उसी देख कर तारे की अजब रात होती है फलक पे चाँद की" अरु" नूरानी बात होती है आराधना राय "अरु"

आये है

भ्रम है उन्हें की वो खुदा बन कर आये है कर्म कर ना सके जो कर्मवीर बन आये है लगा के आग दामन में अब बचाने आये है सुना के राज़ दिल का  दिल लगाने आये है दुनियाँ -ए- दीन की खबर हमको देने आये है लूटा के आशियाँ दिल का अपना बनाने आये है देखती है आँखे ख़ामोशी से रात को जो ख़्वाब खुदा के नाम पे " अरु " को सताने फिर आये है आराधना राय "अरु"

भूल गए

उन को अपना किस्सा -ए-गम भी सुनाना भूल गए उन के पहलू से उठे और आसूँ बहाना भूल गए राज़ और रंजिश के बादल छंट गए सारे तभी   बात हमने इक कही मतलब बताना भूल गए चैन से नींद आ जाएगी हमतो यही सोचा किये दिल से तुम्हारी याद को हम ही मिटाना भूल गए उनकी ये दीवानगी मेरी ही नज़रों में "अरु" याद उस मोहसिन की इस दिल से भूलाना भूल गए   आरधना राय "अरु"

तंज़

तंज़ ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- वो कहते है बात करना छोड़ दो आपस में रिश्ता रखना छोड़ दो  ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- मंदिर में भगवान को पूज कर मस्जिद में कुरान पढ़ना छोड़ दो ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- तलवार मंदिर को करते हो भेंट मानवता का पाठ पढ़ना छोड़ दो --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- बातें अनर्गल करते है रहे वो खुद इंसान को इंसान कहना छोड़ दो ----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- खा रहे जो नेता इंसानो को रोज़ वो कहते है मांस खाना छोड़ दो -----------------------------------------------------------------------------------------------...

छोटी सी बात

साभार गूगल दिल ही समझे दिल की बात। .....                                                      छोटी सी बात  (  लधु -कथा  ) ----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- कोई बात नहीं हुई थी , फिर भी लग रहा था की कोई  शीत युद्धचल रहा है। कनक लगभग अपना सामान बाँध चुकी थी , उसने अनमने ढंग से सुकेश से पूछा " तुम्हारा सामान बांध दू या नहीं" । "नहीं " अख़बार एक तरफ फेक कर उसने दो टूक उत्तर दिया।  कनक को जैसे मालूम था , की सुकेश क्यों उस के मायके उस के साथ नहीं जा रहा बोलना बहुत कुछ चाहती थी मगर बोली नहीं, मन मसोस कर सामान लगाती रही। पता नहीं सुकेश को साथ न देख क्या बोले माँ बाबूजी , मन ही मन वो भयभीत होती रही।  बड़ी देर तक खुद ही अपने माँ बाबूजी की कल्पना कर प्रश्नों के  उत्तर देती रही। टिकट रखने से लेकर , घर का  बिखरा सामान लगाने त...

गिला न हुआ

ज़िन्दगी से कोई गिला न हुआ उससे मेरा सिल-सिला न हुआ  मेरा हमदम ,हमसफर न हुआ उससे मेरा सिल-सिला न हुआ मेरा हमदम ,हमसफर न हुआ उससे मिलना मेरा मिलना न हुआ हम रहे पास या तुझ से दूर " अरु" मुस्कुरा दे तेरे बिन हम से न हुआ आराधना राय "अरु"

कही दूर

रिश्ते कही दूर जब खो जाते है अनकही प्यास से बन जाते है धुप के पास एक ही है निशा साया हर दर का वो बन जाते है किसके आँसुओ में इतना सब है  देख कर उसको बूत से बन जाते है आराधना राय 'अरु'

दरिया

उम्र का दरिया कैसे निगल गया कोई पास से इतने कैसे निकल गया कोई प्यास सहरा ने ना कोई देखी होगी पूरे वज़ूद को कैसे निगल गया कोई तबाही अब न छू पायेगी दामन तेरा तिश्नगी रूह की" अरु" रूह में भर गया कोई आराधना राय "अरु"

हाइकू

साभार गूगल                                           -------------------------------------------------- ------------------------------------------------------------------------           धन्यवाद सहित दिबांग को नमन किया। ५-७-५- हाइकू एक सुनियोजित कला मुक्तक है ----------------------------------------- तमाशा हुआ रोज़ी -रोटी का सौदा महँगा पड़ा। ---------------------------------------------- आदि अनंत जीवन एक पर्व अनुभूति भी हुई ----------------------------------------------- प्यास कोई अनबुझ पहेली ईश्वर की --------------------------------------------------- शब्द ही है प्रकृति की आवाज़ साज़ साज़ भी देता साथ ------------------------------------------------------- अरु करुणा अरूप ही ईश है स्वरूप है --------------------------------------------------- आराधना राय "अरु"                       ...

दिखाई देता

दिखाई देता  -------------------------------------------- धुँआ सा कैसा दिखाई देता है हर एक तन्हां दिखाई देता है सवाल के ख्याल देख लेता है चेहरा कोई यूँ भी पढ लेता है मन की बातें जो कर लेता है उन्हें भी देख ही कहीं लेता है छुपा लाख कोई रख लेता है असली रंग वो देख ही लेता है ज़माना अजब सा देखा "अरु" हर कोई खुद को हूर कह लेता है ------------------------------------------- आराधना राय "अरु " Rai Aradhana ©

दिखाई देता है

   -------------------------------------------- धुँआ सा कैसा दिखाई देता है   हर एक तन्हां दिखाई देता है  सवाल के ख्याल देख लेता है  चेहरा कोई यूँ भी पढ लेता है  मन की बातें जो कर लेता है     उन्हें भी देख ही कहीं लेता है  छुपा  लाख कोई रख लेता है    असली रंग वो देख ही लेता है   ज़माना अजब सा देखा "अरु"  हर कोई खुद को हूर कह लेता है  -------------------------------------------   आराधना राय "अरु " Rai Aradhana ©

शहर की बात

शहर की बात --------------------------------- अब किस शहर की बात हो  जहाँ सुबह सी कोई रात हो हर शख़्स ही जहाँ खास हो अवाम की जहाँ पे बात हो  ना भूख रोटी को  ढूँढती हो  कफन ज़िंदगी ना ओढ़ी हो यूँ इक सरज़मी की बात हो उजालों पर यूँ ना सवाल हो जहॉ रोशन हर ज़हन यूँ हो हर बात पे ना कोई बवाल हो कोई ख़्वाब हसीन नसीब हो "अरु" मंज़िले कुछ करीब हो आराधना राय "अरु" ------------------------------------------------ कफन -श्राउड, मृत्यु का सामान सरज़मी- क्षेत्र, देश अवाम- जनता , पब्लिक शख़्स- आदमी ,,इंसान

कौन सी बात

         साभार गूगल  -----------------------------------------------------           कौन सी बात ---------------------------------------------------- रोप बबूल को आम की बात की कर्म-विधान की कौन सी बात की ----------------------------------------------- जल रहा था देश, पेट की आग से मंदिर जला, मस्जिद को तोड़ कर जाने किस की ख़ुदा की तलाश की हृदय पे मरहम लगा नहीं जो सकते क्यों फिर बस देह- सुगंध की बात की -------------------------------------------------------- जली सैकड़ों ही बस्तियाँ क्या बात थी हम ने जाने किस सभ्यता की बात की पशु की नहीं पशुता से नीची ये बात की क्रांति पे "अरु" अशांत हो कर ही बात की  ------------------------------------------------ आराधन राय "अरु " Rai Aradhana © स्वरचित
सितम ----------------------------------------- खुल गए रास्ते ,बात अब सब आम हुई यूँ ही झंडे पकड़ हाथ में अब हड़ताल हुई देखों जिसे चेहरा ही अजब लिए फिरता है भीड़ में आदमी दीवाना सा क्यों लगता है हर एक शख़्स तुला है अपनी ही कहने को बिसात पे रखा हुआ  प्यादा सा ही लगता है रोज़ बढ़ जाती है गरीब कि लड़की की तरह बढ़ती मँहगाई दिनों दिन ये भी क्या खूब है गरीब कि थाली भी  खाली ही रहने वाली है रोटी की बातें फैशन सा सितम ढाने वाली है ग़रीब की दुआओ का इनाम कोई यूँ  ले गया दवा के नाम पे 'अरु' कैसा वो दर्द साथ ले गया आराधना राय "अरु"  

चाँद

साभार गूगल चाँद तुमने  ना देखा होगा  बादलों में छुप गया होगा काली सी सुनसान रातों को चाँदनी से लिपट गया होगा महक रही है आँगन में मेरे बहके से  हरसिंगार की तरह उसी को देखने वो आया होगा उसे किसी सोच में पाया होगा सांसों में महके जो ख्याल होगा 'अरु' वो तेरे ही साथ यूँ भी होगा आराधना राय "अरु" 

آرزو आरज़ू

साभार गूगल तज्दीद-ए-आरज़ू ------------------------------------------------- जिसे भूले ही नहीं याद क्या उसको करें उसकी हर बात दिल में ही बसा रखी है हर लम्हा उसे सोचते ही गुज़रता रहा यूँ जैसे सहरा से कोई आबशार हो निकला उसकी बातें में तज्दीद-ए-आरज़ू है तेरी उसका ज़िक्र 'अरु' लगता है फरिश्तों सा आराधन राय 'अरु ' --------------------------------------------------------- Renewing desire- तज्दीद-ए-आरज़ू, इच्छा,        آرزو   ================================ جسے بھولے ہی نہیں یاد کیا اس کو کریں اس کی ہر بات دل میں ہی حل رکھی ہے ہر لمحہ اس خیال ہی گزرتا رہا یوں اس کی باتیں میں تجدید-اے-آرزو ہے تیری جیسے صحرا سے کوئی آبشار ہو نکلا اس کا ذکر 'ار' لگتا ہے فرشتوں سا آرادن رائے 'ار'

आहट

तेरे कदमों की आहट पता मेरा क्यों बताती है चले हो साथ मेरे तो निगाहों में बसें ही रहना मेरे दिल के आईने मैं रोज़ चमकती ही रहना कहीं भी धूल मिल जाए तो साफ करते रहना बहुत आसान है किसी से भी प्यार यूँ कर लेना  मुश्किल है किसी के गुनाहों को माफ कर देना मेरी दुनियाँ, तेरी दुनियाँ की बातें पूछते रहना अजब से कायदें कानूनों की 'अरु ' कैद में रहना   आराधना राय  'अरु' नोट - ये नज़्म  मैंने ख़ुद  को एक पुरुष ------आदमी  मान कर  लिखी है  पता नहीं कितनी क़ामयाब  हुईं हूँ , स्त्री  होकर पुरुष कि भाषा बोलने में  ये आप बतायेंगे।   

गुज़रती हूँ گزرتی ہوں

साभार गूगल कोई वादा नहीं फिर भी जाने क्यों मिलती हूँ तुम्हे देख कर जाने क्यों यूँ ही फिर हँसती हूँ ज़माने भर की कई बातें कह कर गुज़रती  हूँ बड़ी खामोशियाँ है ज़िंदगी में खुद से डरती हूँ तेरे सामने से हर रोज़ में जब भी गुज़रती हूँ तेरे चेहरे की लकीरों को जाने क्यों पढ़ती हूँ रह- रह कर ख्यालों से अपने क्यों यूँ डरती हूँ तुम्हें देख कर जाने क्यों" अरु " यूँ मचलती हूँ आराधना राय "अरु" کوئی وعدہ نہیں پھر بھی جانے کیوں ملتی ہوں تمہیں دیکھ کر جانے کیوں یوں ہی پھر ہنستی ہوں زمانے بھر کی بہت سی چیزیں کہہ کر گزرتی ہوں بڑی كھاموشيا ہے زندگی میں خود سے ڈرتی ہوں تیرے سامنے سے ہر روز میں جب بھی گزرتی ہوں تیرے چہرے کی لکیروں کو جانے کیوں پڑھتی ہوں ره- رہ کر كھيالو سے آپ کیوں یوں ڈرتی ہوں آپ کو دیکھ کر جانے کیوں "ار" یوں مچلتي ہوں آرادنا رائے "ار"