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हाइकू




साभार गूगल


                                         
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धन्यवाद सहित दिबांग को नमन किया। ५-७-५-
हाइकू एक
सुनियोजित कला
मुक्तक है
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तमाशा हुआ
रोज़ी -रोटी का सौदा
महँगा पड़ा।
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आदि अनंत
जीवन एक पर्व
अनुभूति भी हुई
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प्यास कोई
अनबुझ पहेली
ईश्वर की
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शब्द ही है
प्रकृति की आवाज़
साज़ साज़ भी देता साथ
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अरु करुणा
अरूप ही ईश है
स्वरूप है
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आराधना राय "अरु"

                                                                               


   

   

 







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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))