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सितम
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खुल गए रास्ते ,बात अब सब आम हुई
यूँ ही झंडे पकड़ हाथ में अब हड़ताल हुई

देखों जिसे चेहरा ही अजब लिए फिरता है
भीड़ में आदमी दीवाना सा क्यों लगता है

हर एक शख़्स तुला है अपनी ही कहने को
बिसात पे रखा हुआ  प्यादा सा ही लगता है

रोज़ बढ़ जाती है गरीब कि लड़की की तरह
बढ़ती मँहगाई दिनों दिन ये भी क्या खूब है

गरीब कि थाली भी  खाली ही रहने वाली है
रोटी की बातें फैशन सा सितम ढाने वाली है

ग़रीब की दुआओ का इनाम कोई यूँ  ले गया
दवा के नाम पे 'अरु' कैसा वो दर्द साथ ले गया

आराधना राय "अरु"  


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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

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