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(हास्य व्यं ग) इश्क -मौहब्बत

तमाम इश्क -मौहब्बत के अफ़साने अधूरे लगते है। सीरी -फरहाद , हीर-राँझा,  सोनी- महिवाल , ससि -पूनो ,रोमियो -जूलियट के फ़साने  बहाने कि तरह लगते है। मौत को बहला कर हो गए वो फ़ना मौहब्बत के लिए गर वो  जीते तो बहलाते किस तरह नून ,तेल लकड़ी में फसी होती सीरी भी हीर भी सोनी भी राशन कि लाइन में खड़े होते फरहाद , राँझे , महिवाल ना जाने  किस तरह या जुटे होते हरे पत्ते कमाने कि होड़ में तब सीरी , ससि ,सोनी, हीर , जूलियट लगी होती जीवन के अजीब -गरीब जोड़ में अब ये बात सोच कर भी हँसी सी आई है जीवन के उहा -पोस में मौहब्बत कहाँ बच पाई है। आराधना राय 

क्या देती

साभार गुगल मैं तुझे इस दिल के सिवा क्या देती अधूरी बची ज़िन्दगी उधार क्या देती तुम एक हसीन सहर की बात करते हो मैं तुम्हें उदासियों कि शाम क्या देती मेरे मुक्क़दर में रोशनी ही  कुछ कम थी मैं तुझे अंधेरों के सिवा यू भी क्या देती तुम वफ़ा के मायने समझा गए मुझको मैं उलझे हुए ज़ज़्बात के सिवा क्या देती आराधना राय
वो कहते है यू तू मरना  छोड़ दे  मेरी बातों को ही करना  छोड़ दे।  तेरे हाथों में अब  वो शफ़ा नहीं है  ज़िंदगी का ये ज़हर पीना छोड़ दे।  रात है कट ही जाएगी ये तेरे बिन  बात -बात पर यू तू रोना छोड़ दे।  अपने से लगते है जो भी लोग तुझे  उन पर एतबार करना भी छोड़ दे  मेरी सब आदतें है उसके जैसी ही  उसको  हम  यू तन्हा कैसे छोड़ दे।  आराधना राय   

जान पर बन आई है

जाने क्यों फिर जान पर बन ये आई है  कोई पहचान है या अज़नबी कोई आई है कहती है सालों से मेरा उसका रिश्ता है फिर हाय -तौबा सी क्यों उसने मचाई है  किस बात का शिकवा है बताने वो आई है साँस लेते है तो उफ सी  निकल ही आई है ज़िन्दगी बहाने से फिर पूछने क्यू आई है दिल के साज़ो -सामान से बहलाने आई है आराधना राय

याद आई है

मुद्दतों बाद चेहरे पे हँसी आई हैं जाने क्यों  उस कि याद आई है वो मुझे रोज़ आ के बता जाता है या  तो मैं हूँ या मेरी ये  तन्हाई है उसे भूलने कि आदत बहुत खूब है मैंने  ना भूलने कि कसम खाई  है उसकी बातों  से मेरा यही रिश्ता है उसकी यादें  है जो निभाने आई है आराधना राय http://aradhanakissekahaniyan.blogspot.in/

सिद्धार्थ - यशोधरा

बुद्ध पूर्णिमा पर विशेष साभार गुगल इमेज ------------------------------------------------------- यशोधरा बिरहन सी जब रोइ थी सिद्धार्थ बिन नयनों को भगोई थी पर ना डरी ना अपना निज खोई थी  प्रतीक्षा रत सज़ग पथ को निहारी थी पी गए लोक हित को बिसार ना पाई थी  वो चिर -सुहागिन हो, सुहाग को खोई थी अहिंसा , सत्य, शांति ,क्षमा  वरद पाई थी सिद्धार्थ , गौतम रूप हुए उनका मन पाई थी

प्रीत का प्याला

साभार गुगल इमेज़ --------------------------------------- साधु हुआ ये जग बेगाना मुरली के संग मीरा नाची राधा संग जैसे हो कान्हा प्रेम कि रीत बड़ी निराली पी गई विष का भी प्याला लोक -लाज़ तज कर हारी बन गई  प्रीत कि ज्योति हार गई अरु ये सब जीवन कह गई ये जग भी दीवाना  कॉपी राइट @आराधना राय

राहत -ए -वस्ल

साभार गुगल इमेज़ जहा से उम्मीद राहत  की कभी पाई है वही जा कर ही ये चोट भी हमें क्यू आई है  तेरे झूठ से भी हमें कभी परहेज़ जब ना था क्यू  सच से अब इस जान पर बन सी आई है उन्हें ही गवारा नहीं किया जब ये साथ मेरा हाल -ए -दिल किस से कहे जो है ये तन्हाई है हमने हर हाल में चलने की फिर कसम खाई है  ना जाने क्यू ये ज़िन्दगी हम से ही शरमाई है कॉपी राइट @आराधना राय

अदा मुस्कुराने की

दूर से सुनते है आहट तेरे ही  आने की  ज़िंदगी कि ये भी अदा है मुस्कुराने की  अब भरम का भी भरम  नहीं मुझको  तू मेरा अक्स है ये बात नहीं बताने की  काँटों पे चलना है और जीना है मुझको  मुझे पता है क्या चाल है इस ज़माने की  तुम करोगे जब भी बात इस ज़माने की  हम भी आग़ाज़ करेंगे किसी फ़साने की  कॉपी राइट @ आराधना राय 

ढूंढते हैं तेरे निशां

साभार गुगल इमेज़  ======================= ढूंढते  हैं तेरे निशां राह - राह में  जानती हूँ सीधे नहीं मेरे ये रास्ते  उम्मीद कि किरणे अभी  पास में        कुहासे भी मिले कभी  मुझे रात में       भूली -भटके ही  ज़िंदगी से मिली में  आंगन बीच दिया सा बनके  जली में आराधना राय

श्रमिक

श्रमिक दिवस पर ---------------------------- श्रम ही जीवन से बंधा है फिर भी श्रमिक तू मरा है महल अटारिया बना के झोपड़ियों में बस पड़ा है  खून, पसीना ,बन गिरा है तेरा कर्म कुंदन बन गया है सृजन मानव का देख कर ईश्वर भी सुखी यही हुआ है आराधना राय

माँ का दुलारा

साभार गुगल इमेज़  तुम आये ज़िन्दगी में कैसा दुलार बन के आँसू छलक रहे थे मन का करार बन के  तुम भोर का सितारा जगमगए बन के  गोदी में था दुलारा पलाश सा तू  दमके   तू मुस्कुराया, झिलमिलाये तार मन के  लगा ज़िन्दगी आई एक बार फिर चल के    तेरे लिए सहे है ज़ोर, ज़ब्र,हर पल सब के  फिर क्यों उदास है तू माँ के साथ हँस दे  आराधना राय 

वज़ूद

साभार गुगल इमेज़ तमाम उम्र बग़ैर शज़र के गुज़रीं ज़िंदगी कैसी भी थी धूप में गुज़री मुझी से वो वादे हज़ार क्यू करता है मुझे भूल जाने कि बात भी करता है जला के घर मेरा वो क्यू अब हँसता है जाने किस आशियाने कि बात करता है मेरा वज़ूद है उस से मुझे वो ये कहता है  मेरे ही यादों के दरिया में बहता रहता है आराधना राय

ज़िंदगी

साभार गुगल इमेज़ समुंदर भी कश्तियाँ को तोड़ देते है तूफानों में जिन्हे साहिल छोड़ देते है ख़ुशी कि उम्मीद पर ग़म ले लेते है हाल दिल का सब से बयां कर देते है अपना नाता दुनियाँ से जोड़ लेते है गुनाह अपने ही  सर हम ओढ़ लेते है खिज़ा में पत्ते भी साथ छोड़ देते है ग़िला क्या उनसे जो हाथ छोड़ देते है ज़िंदगी इसी बहाने से तुझे देख लेते है आँसुओ में भी खुशियाँ ढूंढ ही ज़ी लेते है आराधना राय

जीवन पुकार

प्रीत कि डगर सब से खरी  होती है यहाँ जीत हार किस कि कब होती है मन में प्रेम निष्ठा उत्कृष्ठ होती है मन रहे तृषित जब भी पुकार होती है बनते सवरते जीवन में आस होती है सूर्ये कि क्या कभी यू हार भी होती  है अंतस  में ही अंतःसलिला भी होती है जीवन पुकार चलने के लिए होती है आराधना राय  

भगवान परेशान हुआ

भूख, तृष्णा ,प्यास,जीवन बना हाहाकार मृत्यु से रचा बसा हुआ है ये सकल संसार रुष्ट है भगवान या सृष्टि का अंत हुआ है कलरव मचा कैसा ये कौन सा धुँआ उठा है मन नहीं तन भी यहाँ पर व्यापार हुआ है जीने का कौन जाने साज़ो समान हुआ है हर कोई इस दौर में क्यू भगवान हुआ है देख कर भगवान भी अब परेशान हुआ है। आराधना राय

प्रेम

साभार गुगल इमेज़ बनता  नहीं प्रेम कॉपी किताबों कि तरह कोई  रहता मौन मन में सितारे कि तरह   जहां खिली में बन के हरसिंगार कि तरह  वही सर्वस्व लुटाया था धरा कि ही तरह  क्यों बुझते है अनबुझ सी  पहेली कि तरह  जब मैं ना थी किसी कि भी सहेली कि तरह  मान का कहां जब बिके समान कि ही तरह कहे कैसे जब रहे हम बन के सज़ा कि तरह आराधना राय 

कसक

मन कि कसक मन में ही कही  रहती है इंसानियत परिंदो के मानिंद  ही रहती है   मन हिंडोले कि तरह यही बस कहता है  तू कही भी रहे मेरे आस -पास  रहता  है  मन में बेचैनियाँ खुमार बेशुमार रहता है  मैं तेरी हूँ कि नहीं कोई बार बार कहता है  एक बार ज़ी उठू तेरे साथ पहले कहता है बात लम्हों कि है क्यों हर बार कहता  है  आराधना राय  

अमृत रस

सुन रहे है हम सुन रहा है तू  साथ चल मेरे कह रहा है तू  नैन ये कहे प्रीत कर रहा है तू   सुख कि आस में ज़ी रहा है तू जीवन अमृत सा पी रहा है तू आँखों में मधुरिम रस बसा तू प्रीत कि नौका चले कह रहा तू  ज़िन्दगी कि फिज़ाओ में भी तू समुंदर मंथन का जीवन सार  तू विष को जीत अब अमृत रस  पी मन में बस रहा सुगंध कि तरह ज़ी तेरे उजाले बड़े निराले कह रहा है तू  आराधना राय