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सिद्धार्थ - यशोधरा

बुद्ध पूर्णिमा पर विशेष साभार गुगल इमेज ------------------------------------------------------- यशोधरा बिरहन सी जब रोइ थी सिद्धार्थ बिन नयनों को भगोई थी पर ना डरी ना अपना निज खोई थी  प्रतीक्षा रत सज़ग पथ को निहारी थी पी गए लोक हित को बिसार ना पाई थी  वो चिर -सुहागिन हो, सुहाग को खोई थी अहिंसा , सत्य, शांति ,क्षमा  वरद पाई थी सिद्धार्थ , गौतम रूप हुए उनका मन पाई थी

प्रीत का प्याला

साभार गुगल इमेज़ --------------------------------------- साधु हुआ ये जग बेगाना मुरली के संग मीरा नाची राधा संग जैसे हो कान्हा प्रेम कि रीत बड़ी निराली पी गई विष का भी प्याला लोक -लाज़ तज कर हारी बन गई  प्रीत कि ज्योति हार गई अरु ये सब जीवन कह गई ये जग भी दीवाना  कॉपी राइट @आराधना राय

राहत -ए -वस्ल

साभार गुगल इमेज़ जहा से उम्मीद राहत  की कभी पाई है वही जा कर ही ये चोट भी हमें क्यू आई है  तेरे झूठ से भी हमें कभी परहेज़ जब ना था क्यू  सच से अब इस जान पर बन सी आई है उन्हें ही गवारा नहीं किया जब ये साथ मेरा हाल -ए -दिल किस से कहे जो है ये तन्हाई है हमने हर हाल में चलने की फिर कसम खाई है  ना जाने क्यू ये ज़िन्दगी हम से ही शरमाई है कॉपी राइट @आराधना राय

अदा मुस्कुराने की

दूर से सुनते है आहट तेरे ही  आने की  ज़िंदगी कि ये भी अदा है मुस्कुराने की  अब भरम का भी भरम  नहीं मुझको  तू मेरा अक्स है ये बात नहीं बताने की  काँटों पे चलना है और जीना है मुझको  मुझे पता है क्या चाल है इस ज़माने की  तुम करोगे जब भी बात इस ज़माने की  हम भी आग़ाज़ करेंगे किसी फ़साने की  कॉपी राइट @ आराधना राय 

ढूंढते हैं तेरे निशां

साभार गुगल इमेज़  ======================= ढूंढते  हैं तेरे निशां राह - राह में  जानती हूँ सीधे नहीं मेरे ये रास्ते  उम्मीद कि किरणे अभी  पास में        कुहासे भी मिले कभी  मुझे रात में       भूली -भटके ही  ज़िंदगी से मिली में  आंगन बीच दिया सा बनके  जली में आराधना राय

श्रमिक

श्रमिक दिवस पर ---------------------------- श्रम ही जीवन से बंधा है फिर भी श्रमिक तू मरा है महल अटारिया बना के झोपड़ियों में बस पड़ा है  खून, पसीना ,बन गिरा है तेरा कर्म कुंदन बन गया है सृजन मानव का देख कर ईश्वर भी सुखी यही हुआ है आराधना राय

माँ का दुलारा

साभार गुगल इमेज़  तुम आये ज़िन्दगी में कैसा दुलार बन के आँसू छलक रहे थे मन का करार बन के  तुम भोर का सितारा जगमगए बन के  गोदी में था दुलारा पलाश सा तू  दमके   तू मुस्कुराया, झिलमिलाये तार मन के  लगा ज़िन्दगी आई एक बार फिर चल के    तेरे लिए सहे है ज़ोर, ज़ब्र,हर पल सब के  फिर क्यों उदास है तू माँ के साथ हँस दे  आराधना राय 

वज़ूद

साभार गुगल इमेज़ तमाम उम्र बग़ैर शज़र के गुज़रीं ज़िंदगी कैसी भी थी धूप में गुज़री मुझी से वो वादे हज़ार क्यू करता है मुझे भूल जाने कि बात भी करता है जला के घर मेरा वो क्यू अब हँसता है जाने किस आशियाने कि बात करता है मेरा वज़ूद है उस से मुझे वो ये कहता है  मेरे ही यादों के दरिया में बहता रहता है आराधना राय

ज़िंदगी

साभार गुगल इमेज़ समुंदर भी कश्तियाँ को तोड़ देते है तूफानों में जिन्हे साहिल छोड़ देते है ख़ुशी कि उम्मीद पर ग़म ले लेते है हाल दिल का सब से बयां कर देते है अपना नाता दुनियाँ से जोड़ लेते है गुनाह अपने ही  सर हम ओढ़ लेते है खिज़ा में पत्ते भी साथ छोड़ देते है ग़िला क्या उनसे जो हाथ छोड़ देते है ज़िंदगी इसी बहाने से तुझे देख लेते है आँसुओ में भी खुशियाँ ढूंढ ही ज़ी लेते है आराधना राय

जीवन पुकार

प्रीत कि डगर सब से खरी  होती है यहाँ जीत हार किस कि कब होती है मन में प्रेम निष्ठा उत्कृष्ठ होती है मन रहे तृषित जब भी पुकार होती है बनते सवरते जीवन में आस होती है सूर्ये कि क्या कभी यू हार भी होती  है अंतस  में ही अंतःसलिला भी होती है जीवन पुकार चलने के लिए होती है आराधना राय  

भगवान परेशान हुआ

भूख, तृष्णा ,प्यास,जीवन बना हाहाकार मृत्यु से रचा बसा हुआ है ये सकल संसार रुष्ट है भगवान या सृष्टि का अंत हुआ है कलरव मचा कैसा ये कौन सा धुँआ उठा है मन नहीं तन भी यहाँ पर व्यापार हुआ है जीने का कौन जाने साज़ो समान हुआ है हर कोई इस दौर में क्यू भगवान हुआ है देख कर भगवान भी अब परेशान हुआ है। आराधना राय

प्रेम

साभार गुगल इमेज़ बनता  नहीं प्रेम कॉपी किताबों कि तरह कोई  रहता मौन मन में सितारे कि तरह   जहां खिली में बन के हरसिंगार कि तरह  वही सर्वस्व लुटाया था धरा कि ही तरह  क्यों बुझते है अनबुझ सी  पहेली कि तरह  जब मैं ना थी किसी कि भी सहेली कि तरह  मान का कहां जब बिके समान कि ही तरह कहे कैसे जब रहे हम बन के सज़ा कि तरह आराधना राय 

कसक

मन कि कसक मन में ही कही  रहती है इंसानियत परिंदो के मानिंद  ही रहती है   मन हिंडोले कि तरह यही बस कहता है  तू कही भी रहे मेरे आस -पास  रहता  है  मन में बेचैनियाँ खुमार बेशुमार रहता है  मैं तेरी हूँ कि नहीं कोई बार बार कहता है  एक बार ज़ी उठू तेरे साथ पहले कहता है बात लम्हों कि है क्यों हर बार कहता  है  आराधना राय  

अमृत रस

सुन रहे है हम सुन रहा है तू  साथ चल मेरे कह रहा है तू  नैन ये कहे प्रीत कर रहा है तू   सुख कि आस में ज़ी रहा है तू जीवन अमृत सा पी रहा है तू आँखों में मधुरिम रस बसा तू प्रीत कि नौका चले कह रहा तू  ज़िन्दगी कि फिज़ाओ में भी तू समुंदर मंथन का जीवन सार  तू विष को जीत अब अमृत रस  पी मन में बस रहा सुगंध कि तरह ज़ी तेरे उजाले बड़े निराले कह रहा है तू  आराधना राय 

मन कि वृद्धि

मन कि वृद्धि -------------------- रोज़ - एक ही सोच थी सब कुछ बदल जायेगा वक्त के साथ परेशानी चली जाएगी और जीवन  सरल हो  भी यही पायेगा। उस दिन वो धबरायेगी नहीं साहस से जीवन महकाएगी इस  कशमकश में जी पायेगी उस लड़की के पिता नहीं थे पर ज़िम्मेदारी थी बोझ थी   इसलिए ज़िन्दगी हँस  कर  भुला रोज़ -यही सोचती थी  सब परेशानी  चली  जायेगी  जीवन जीने के लिए कोई सरल युक्ति  भी आएगी।  पर सोच लेने से मात्र  से जीवन आसान कब हुआ  है ऑफिस में जीवन संघर्ष हुआ है  लेने - देना से ही यहॉ  सब है कनेक्शन प्रमोशन यही  सब मन में अरमान आस भी एक  तनख्वाह में बढ़ोतरी हो जाये,  पर ऐसा कब हुआ, ऑफिस में सब से कम काम करने वाली सुंदरी भी उस से बाज़ी मार गई अप्रेज़ल वाले दिन सब पा गई   ज़ुबा पर ताले मन बेचैन थे सबने  नया सबक सीखा था।  नए बॉस  चाय पीते देखा था , बात प्रेम या प्रीत कि नहीं थी अन्तर मन,भी  इन्टर- क...

गज़लें अश्क में ढाली हुई

मेरे नाम दिन के उजाले हुए है अंधेरों को हम क्यों पाले हुए  है किन मज़बूरियों में  ढाले हुए  है हालत तंग दिल में छाले  हुए  है ख्वाब क्यों हमने फिर पाले हुए है  हसरतों कि ख्वाहिशें जाने  हुए  है ================================= गर ज़िन्दगी तू ख्वाब है क्यों हसरतों के नाम है देख शिवालय भी गिरते  है मरते है उफ नहीं करते है लोग जीवन के लिए रोज़ मर कर भी यही उठते है कौन सा कहर था आँखों पे अश्क बन के जो निकलते  है सिर्फ एक निवाले के लिए नहीं ज़िंदगी जीने के लिए जलते है मौत तू आ भी गई कहीं से गर तेरे सामने हंस के गुज़रते से  है ज़िन्दगी भूख सही दर्द  गम सही अश्क  आँखों में भर के हँसते  है आराधना नेपाल त्रासदी पर -------------------------------------------- कैसा ये शोर उठा ,हर तरफ कहर जारी पत्थर दिल मोम हुए रूठी दुनियाँ  सारी लगी हुई थी नर्तन करने चारों ओर तबाही माँ से बच्चे अलग हुए यू टूटी दुनियाँ सारी मिलने और बिछड़ने में ही लगा हुआ संसार सब अपने...

तक़दीर

हमकदम को मेरी तक़दीर बदलनी होगी पास आ के कोई बात भी तो करनी होगी  कल की उम्मीद पे बातें नई करनी  होगी गले मिलने के लिए सामने आना  होगा हुई गलती तो माफ भी तो  करना होगा राहतें वस्ल तो  यू भी चुननी ही  होगी  आराधना  राय 

शिखर

शिखर उन्नंत भाल तेरा रखेगा  मान मेरा तू मुस्कुराएगा चाँद भी आएगा तारों में तारा ध्रुव तारा कहलायेगा नभ में जलतरंग सा लहराएगा पर्वत पर  विजित हो शिरोमणि हो जायेगा माँ का सपूत हर कोई शिखर ही हो जायेगा चन्द्र ,तारा ,निशा , शुभ गणक फल पाएगा कर्म के फल सब शुभ  हो जायेंगे ,अमित जीवन  फल पायेगे  वंदना , अर्चना आराधना   से नित्य  ही अपने अपने ईश्वर   हो पायेगे  स्रृष्टि , से भक्ति बन  जगत जलचरतू शुभ हो जायेंगे  राम कि अयोध्या ,  शाम और राधा का प्रेम यही पायेगे  विश्व जब सद भावना के लिए  विश्व -बंधुत्व दिवस बन जाएगा  फिर कोई एक दूसरे से अलग कैसे रह पायेगा  गायन , वादन , नृत्य से  कला देवी शारदा जब आएगी  राम -राज्य बन साकेत   सा जीवन यही हो जायेगा प्रेम कि धारा ,सूर्ये कि शक्ति भी पायेगी  जब  जीवन तू स्वयं शिव सार्थक हो जायेगा  तब पार्वती को शिव राधा को कृष्ण पाकर  गणेशं कि मंगल कामना से ...

कहते जाए

सकून जो दिल को भी आ जाए फिर उन को करार भी आ जाए  हसरतें ,उमगे जब उठती जाए   मोज़ों में रवानी भी कुछ आये सितम क्यों हर घड़ी सहते जाए क्यों ना अपना तुम्हे कहते जाए आराधना