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देखे कोई

देखे कोई ------------------------------------------------- मैं रास्ता नहीं कि गुज़र गया कोई उम्र कि दहलीज़ पर छोड़ गया कोई कुछ तो तेरा मेरा वास्ता होगा कोई सदियों तक इंतज़ार नहीं करता कोई रूह से रूह का फासला यू हुआ है कोई  जो तेरे मेरे दरम्यान आ गया है कोई उम्मीद दिल से ही लगता है फिर कोई  बात जो रह गई वो ही बताता है यू कोई साथ  ये छूटने वाला कहाँ है  देखे कोई हँस के कह दी है बात "अरु" तुमने कोई आराधना राय                       دیکھے کوئی ------------------------------------------------- میں راستہ نہیں کہ گزر گیا کوئی عمر کہ دہلیز پر چھوڑ گیا کوئی کچھ تو تیرا میرا واسطہ ہوگا کوئی صدیوں تک انتظار نہیں کرتا کوئی روح سے روح کا فاصلہ یو ہوا ہے کوئی جو تیرے میرے درمیان آ گیا ہے کوئی امید دل سے ہی لگتا ہے پھر کوئی بات جو رہ گئی وہ ہی بتاتا ہے یو کوئی ساتھ یہ چھوٹنے والا کہاں ہے دیکھے کوئی ہنس کے کہہ دی ہے بات "ار" تم نے کوئی

सताने आई है

किसकी   याद  थी जो सताने आई है कौन सी  बात पे ये  आँखे भर आई है तुझे याद ना करने कि क़सम खाई है इस बात से दिल पे  चोट क्यू आई  है तू ज़हन में सवालात बन  कर आई है जवाबों कि किताब तू बन नहीं पाई है फैसला तद्बीर से बदलने क्यों आई है  दख़ल दे   'अरु' वो क़त्ल करने आई है आराधना राय

यू ही सही

उसे मेरा चेहरा इस तरह नागवार गुज़रा वो मुझे बिना देखे ही सामने से ही गुज़रा मेरी हर बात का ताल्लुक  उस से  रहा था सफ़र में अनजान क्यों मुझ से ही रहा था कितने हसीं ख्वाबों को रोज़ ही तोड़ा उसने ये दिल ना तोड़ पाया जो  उजड़ा  खुद उसने  दिल के अरमान थे  चलों नए फूल अब चुनें  उज़डा सा इक  दयार है उसे सजा के ही चलें ये तश्नगी मालूम है कुछ पल के लिए ही सही तड़प सहरा कि है 'अरु' देख लो हमें यू ही सही  आराधना राय

खो गई है.

वो सड़क जो तेरे घर तक जाती थी कहीं मुझ से खो गई है. मेरी आँखों से ओझल हो किसी और कि वो अब हो गई है  मालूम नहीं अब किस नाम से मशहूर  वो यहा हो गई है कौन सा मोड़ था मुड़ गए थे और वो यू  ही खफ़ा हो गई है रात कि वीरानियाँ दिल में लिए भटके आज वो चुप हो गई है नया सा नाम लेकर पुराने लिबास में कहा खड़ी हो गई है ज़िन्दगी के कौन से दोराहे पर मुझ से जुदा  हो गई है वक़्त और हालत कि  गर्दिश में यू ही  वो कहीं  फिर खो गई है नाकाम ख्वाहिशें रास्ते के ज़द में मंज़िलों से दूर हो गई है आराधना राय 

आशिकी

वो गम ज़दा था नसीहत ना रास आई उसको परेशां था ज़माना ना कभी बहका पाया उसको  ख्वाब देखने कि कभी भी आदत नहीं थी उसको रात किसी तस्वुर ने फ़िर से चौकाया था उसको कौन  सी हक़ीक़त बयां कर रोकता वो भी उसको वो फूलों कि सेज़ पर नहीं काटो पर बैठता उसको वो आशना था आशिकी ना कभी रास आई उसको अपना दिल लिए वो पत्थर को मनाता रहा बरसों आराधना राय

बात थी

                            बात  थी  कुछ अजीब रात थी ,शायद वो पहली मुलाक़ात थी भीड़ में अकेले थे लेकिन  उसकी अलग पहचान थी  उदास चेहरा पे आँखों में चमक आज भी मुझे याद थी  वो सोचता ज़्यादा था,यही उसकी यही ये खास बात थी  दुनियाँ के तौर तरीकों से नहीं  कोई उसकी पहचान थी  उसकी पेशानियों पे लिखी यू तो हर रोज़ कि ही बात थी  अपने दुख  दर्द से उसकी एक ज़माने से कोई पहचान थी   उसकी ख़ामोश निगाहों में   "अरु " अज़ीब सी  बात  थी  आराधना राय  

खालिश

                   खालिश -------------------------------------------------- मेरे हिस्से में आई  कड़ी धुप थी चाँद रातों कि कहीं सौगात न थी मेरे दामन से भी वो बच कर चला बदनामी कुछ मेरे साथ कम ना थी थी खालिश दिल में तेरी ही यादों कि  बातों कि वो चुभन साथ ही मेरे थी मेरे  दीवानेपन पर यू ही हंस दिए थे  इज़ाफा रुसवाई का "अरु" कर रहे थे   आराधना राय

क्यू

            -------------------------------------------------        ज़ख़्म फिर से  दिल के हरे क्यू हो गए          वो जो कब तलक ही सूख जाने वाले थे          बरसों हम  उन के लिए क्यू जी लिए            अगर वो हम से रूठ के जाने वाले थे           मेरे क़ातिल को पता था मेरा भी मकां            उस से बच कर कब निकलने वाले थे            अजीब बात थी वो शख़्स भी सौदाई हुआ          कल तलक जिस बाज़ार में बिकने वाले थे  आराधना राय  ==================================

सौदा

                       ---------------------------------------------------- एक सौदा कर लिया है इश्क़ के बाज़ार में तेरे  नाम पर मरना जीना तेरे ही नाम पे तुम्हारी आदतों में मेरी आदतें भी शुमार है तेरी  आवाज़ में मेरी आवाज़  का ख़ुमार है ये मिरज़ -ए -इश्क़ है नाकामियों के नाम पे हम खुद आ कर रूक गए है एक तेरे नाम पे साथ तेरे यू चल पड़ा बस  क़ाफ़िला था नहीं हमसफ़र कोई कहाँ था "अरु" तन्हां ही सही आराधना राय

अलख जगाये

अलख जगाये  ====================== अपने नयन खुवायें आज पी ही  लुभाये सखी मुझे पी बुलाए  जिया मेरा क्यू हर्षाए  सोवत  जागत ही तुम संग जन्म ही बिताये ये जग बैरन है  साधु ड़ोर ही अब छूटी जाये आराधना *

आराधना * बाबा नागा अर्जुन और कबीर जी के जन्म विशेष पर

आराधना *  बाबा नागा अर्जुन और कबीर जी के जन्म विशेष पर  -------------------------------------------------------- नमन करुँ उस प्रवीण आत्मा को उससे उपजी गहरी सी साधना को दे रहे  कबीर भी अपनी ओज वाणी नागार्जुन जगा  रहे थे समाज वाणी समाज रहेगा सदा ही अनुग्रह ऋणी  हिंदी भाषा ने पाई थी  समृद्धि धनी  सूर्ये  भी यहाँ झुके नतमस्तस्क हो  कर्म पथ के वीर बात करते गंभीर  आराधना

बात

=============================================== बात है राज़ क्या यू  बताये अपना ये हकीकत है वो मानते है  सपना कौन कैसे जाने कब जी ही जाता है कौन मुक़दर को यू ही  आज़माता है मुझे साहिल कभी यू मिले ही नहीं समुंदर मैं डूबी यू ही चली जाती हूँ हम जिए या ना जीये तेरे अरमान में ज़िन्दगी अपनी रौ में बही ही जाती है कल का सामान बांध ले तू बस अभी आज कि रुखसती "अरु" हुई जाती है आराधना राय

पर्यावरण पर कविता .....धरती का दुःख

पर्यावरण पर  कविता धरती का दुःख …………………….............................................. वो बुरी शक्ल लिए मिलने आई थी हाथों मैं कटोरा भीख का ले आई थी रूखे -सूखे  केश लिए कहने आई थी आहात थी दुःख साथ ही ले आई थी आँखों में आँसू भर वो जब कराही थी दर्द कि आवाज़ नहीं सुनाने आई थी धरती थी अपनी पीड़ा बताने आई थी कौन सी त्रासदी उसे नहीं रास आई थी वृक्ष , वन , नदी सब का दर्द ले आई थी बात  किसी कि समझ  में नहीं आई थी प्रकृति का उपहास मनुज ने  उड़ाया था विपति उपहार स्वरुप घर ले  आया था जब धरा ने तीष्ण हथियार ही उठाया था हाय किस्मत ने भी तो बड़ा ही रुलाया था आदति जब श्रृंगार कर के स्वयं ही आई थी मनुज तूझे  बलात्कार क्यों रास आया था आराधना राय

वक़्त

वक़्त ---------------------------------------------------- जाते हुए वक़्त को मैं थाम नहीं सकती  क्यू  मुझे वो गुज़रा वक़्त याद आता है देख आये है इस  दुनियाँ भर के मेले को मेरा बचपन अभी तक ही मुझे रुलाता है किसकी उगली थी थाम कर चली कभी  तेरा साया था वो आज भी याद आता है थोड़ा सकून ज़िन्दगी तुझे  मिलता नहीं    दिन का शोर ही रातों में भी क्यू डराता है  मन ये पंछी कि तरह ही क्यू उड़ा जाता है जाने किस कि खोज  ये कहा को जाता है कितना पागल है कुछ समझ नहीं आता है  कौन किस के लिए यू लौट के आ  जाता  है  कह कर नहीं आता बेवक़्त ही आ जाता है  ये बुरा वक़्त "अरु" बता कर कहा आता  है  आराधना राय   

किसके लिए

वो जलाता रहा आँधियो में दिये ना जाने क्यों और किसके लिए एहसास अपने आप में कोई लिए वो चल रहा था जाने किसके लिए पैरों छाले और ज़ख़्म दिल में लिए वो भरता रहा बस औरों के ही किये वो मुरीद था तेरा ये ही बताने के लिए क्यों बैठा है वो यू  इस ज़माने के लिए आँख में आँसू का एक बस कतरा लिए चुप है बड़ी देर से "अरु"जाने किसके लिए

ज़िंदगी

एक शज़र ही काफ़ी है साया देने को  एक चिंगारी  बहुत है आग लगाने को  फिर  जाने क्यों गुलिस्तां जल जाते है  कितने ही काफ़िले मरघट तक जाते है  वो कौन है जो बस खुदा पा ही  जाते है  चन्द लम्हें ज़िन्दगी के जी ही जाते है   हमें ज़िंदगी लगती है सदी  मनाने को  आराधना राय 

वो फुटपाथ

वो फुटपाथ पर दिन भर सामान बेचती थी  रात भर जिस्म का वो भी बाज़ार देखती थी  इश्क़ के नाम पर वो पैगाम क्या भेजती थी  वहशियत का रोज़ वो इनाम खुद झेलती थी   हाथ -फैला  हर  रोज़ चन्द सिक्के देखती थी  अपने हाथ में वो क़िस्मत का नाम देखती थी  उम्र भर जाने किसकी वो क्यू राह देखती थी   जीने कि चाह में रोज़ ही मर कर वो देखती थी  नज़्म आराधना राय 

क्या पाओगे

आज हूँ तुम कल मुझे नहीं तुम पाओगे मेरी आवाज़ भी सुन नहीं तुम यू पाओगे दिल ही दिल में तुम भी खूब  पछताओगे मुझ को खोकर बता तुम यहाँ क्या पाओगे रूठ कर तुम भला क्या मुझ से दूर जाओगे ज़र्रे -ज़र्रे में मुझको ही तुम  बिखरा पाओगे उलझनें अपनी ही खुद तुम यू बढ़ा जाओगे हर जगह वीरान सी मेरे बगैर तुम पाओगे ना रो सकोगे तुम फिर ना यू मुस्कुरओगे दिल के टूटने कि आवाज़ ही सुन पाओगे मेरे ज़ख़्मों को कुरेद कर तुम क्या पाओगे मैं जो रोइ तो तुम भी तो अश्क़ बहाओगे नज़्म  .... आराधना राय

सुना मुझे

           सुना मुझे ------------------------------------------------- ज़िन्दगी कोई और कहानी  तू सुना मुझे भूख और प्यास कि बातें यू ना सुना मुझे मेरे  हालातों ने ही बहुत मार गिराया मुझे अपनी क्या बात यू  ही अब मैं बता दू तुझे मेरे रोने पर क्यों  ना कभी रोना आया उसे  मेरा हमदर्द था बाज़ार में ले आया वो मुझे अपने  हाथों में डोर बांध ले कर आया मुझे मैं उसकी कठपुतली हूँ ये बताने आया मुझे आराधना राय

गीत वहीं गाते हो

तुम गीत वहीं फिर गाते हो जो उर में आन समाता है उषा कि प्याली में रचे बसे रश्मि का दीप जलाता है, अपराह्न समय भानू वीर अग्नि सा बरस कर जाते है ग्रीष्म ऋतु से हिय में क्यों संताप प्रहार कर के जाते है निशा कि चादर को ओढ़े चंद्र मन ही मन मुस्काता है चपल चाँदनी कि आभा से स्निग्ध् स्नान जग पाता है निंद्रा कि बाहों में जब मंद समीर मन को बहलाता है तारों कि चुनरीया ओढ़े कोई स्वपन नए से दे जाता है गीत मुझे हर दिन ही दिवस रात्रि में भेद बतलाता है जाने वाले थोड़ा रुक जा दिन ही रीता सा जाता है आराधना राय