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यू ही सही




उसे मेरा चेहरा इस तरह नागवार गुज़रा
वो मुझे बिना देखे ही सामने से ही गुज़रा

मेरी हर बात का ताल्लुक  उस से  रहा था
सफ़र में अनजान क्यों मुझ से ही रहा था

कितने हसीं ख्वाबों को रोज़ ही तोड़ा उसने
ये दिल ना तोड़ पाया जो  उजड़ा  खुद उसने 

दिल के अरमान थे  चलों नए फूल अब चुनें 
उज़डा सा इक  दयार है उसे सजा के ही चलें

ये तश्नगी मालूम है कुछ पल के लिए ही सही
तड़प सहरा कि है 'अरु' देख लो हमें यू ही सही 
आराधना राय


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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"