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वक़्त

वक़्त
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जाते हुए वक़्त को मैं थाम नहीं सकती 
क्यू  मुझे वो गुज़रा वक़्त याद आता है

देख आये है इस  दुनियाँ भर के मेले को
मेरा बचपन अभी तक ही मुझे रुलाता है

किसकी उगली थी थाम कर चली कभी 
तेरा साया था वो आज भी याद आता है


थोड़ा सकून ज़िन्दगी तुझे  मिलता नहीं   
दिन का शोर ही रातों में भी क्यू डराता है 

मन ये पंछी कि तरह ही क्यू उड़ा जाता है
जाने किस कि खोज  ये कहा को जाता है

कितना पागल है कुछ समझ नहीं आता है 
कौन किस के लिए यू लौट के आ  जाता  है 

कह कर नहीं आता बेवक़्त ही आ जाता है 
ये बुरा वक़्त "अरु" बता कर कहा आता  है 
आराधना राय   



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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))