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पर्यावरण पर कविता .....धरती का दुःख

पर्यावरण पर  कविता

धरती का दुःख
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वो बुरी शक्ल लिए मिलने आई थी
हाथों मैं कटोरा भीख का ले आई थी

रूखे -सूखे  केश लिए कहने आई थी
आहात थी दुःख साथ ही ले आई थी

आँखों में आँसू भर वो जब कराही थी
दर्द कि आवाज़ नहीं सुनाने आई थी

धरती थी अपनी पीड़ा बताने आई थी
कौन सी त्रासदी उसे नहीं रास आई थी

वृक्ष , वन , नदी सब का दर्द ले आई थी
बात  किसी कि समझ  में नहीं आई थी

प्रकृति का उपहास मनुज ने  उड़ाया था
विपति उपहार स्वरुप घर ले  आया था

जब धरा ने तीष्ण हथियार ही उठाया था
हाय किस्मत ने भी तो बड़ा ही रुलाया था

आदति जब श्रृंगार कर के स्वयं ही आई थी
मनुज तूझे  बलात्कार क्यों रास आया था
आराधना राय













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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))