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उदासी नज़्म

तमाम ख्वाहिशें पल में खाक हुई बात ही बात में क्या खता हुई किसी दरख्त का साया पासबां नहीं धुप रास्तों कि जब नसीब हुई पाँव  नहीं दिल पे छाले पाए है  गम मिरे नाम इतने आए है बू - ए आवारा पूछती रही गम का सबब भटकती रही थी यू  भी तेरे बगैर कहीं शाम के बाद  तेरे  निशां होंगे कहाँ वक़्त से गुज़रें तो अब हम होगे कहाँ जश्न रुसवाइयों का मानते भी क्यों सामने खुदा रहा अरु उसे भुलाते भी क्यों आराधना राय अरु

इल्ज़ाम

  एक मज़बूरी कितनो को रुला देती है  कभी सवाल कभी जवाब सुना देती है रुठते वक़्त में अपना सा बना देती है  कांपते होठो से  नाम तेरा ही लेती  है माना गम से दो चार करा भी देती है कितने इल्ज़ाम दिल में ये उठा देती है  एक  बे -नूरी पे कालिया खिल जाती है ये बात दिवार दर दिवार हुई क्यू जाती है दिल के हालात का रोना क्या रो जाती है इस जहां को क्यू तू दीवाना बना जाती है

क्या पा लेती

क्या पा लेती -------------------------------- मैं जी तो क्या जी लेती अपनी आस ही जी लेती चाँद तुझे ही  निहार लेती तृषा चातक कि पी लेती भर्मित हो जीवन जी लेती ऐसे जी कर क्या पा लेती सुख का आधार पा लेती उर में बसे प्राण पा लेती अपने सपनों में जी लेती अपने ह्रदय को पा लेती आराधना 

सृजन

पीड़ से जन्म हुआ होगा  तब ही सृजन हुआ होगा  कपोल पर छलके तो होगे  रुदन में भी तो ये  ढ़ले होंगे  अवसाद मन में जब सहे होंगे  कातर हो अश्रु भी तो गिरे होंगे 

सपनें

रंग हीन गंध हीन जीवन में सब सपनें निस्सार हो गए।  क्यू चल -अचल जगत  प्रीत  के आँसू अब  व्यापार हो गए। नभ के पंक्षी जल -चर भी जैसे  नीरस और बेकार हो गये कैसे। ईश्वेर भी स्वर हीन  हो गए जैसे जग के कारोबार हो गए  हो  ऐसे। आराधना 

रेख़्ती *देवनागरी लिपि में

रेख़्ती *देवनागरी लिपि में चाँद फिर दरीचों से तो  झाँकता है बात  ख़्वाब सी हर   कोई करता है आहटें रोज़ सुनती है सूखे -पत्तों कि वक़्त के आने और तेरे चले जाने कि  कड़ी बांध कर चलते रहे , सहराओं में रेत पर चलते रहे ,यू ना जाने कब तक थे सहे ज़ुल्म मैंने तन्हा साल दर साल क्यू तेरे आँख में है नमी अब ये आई है।  आराधना  उर्दू बज़्म में सिर्फ अना  हिंदी नाम का संक्षिप्ति करण। -----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

जीवन भर अँधेरे में

जब बीत ही गया सावन  घन आया तो क्या आया  गई जब उम्र ही ये बीत कोई भाया तो क्या भाया जीवन भर अँधेरे में भटकती रही व्याकुल कोई दिया  समाधी पर मेरी लाया तो क्या लाया आराधना

कवित -परंग

                                    कवित -परंग  -------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- बोल कोई मीठे कोई बोलता है वही मन में कहीं समां जाता है भाव विह्ल हो मूक हो जाते है , शब्द नए गढ़ जीवन  पाते  है कोई  रूप रंग  में ढल जाते है फिर भावों में सृजन पलता है सुख सपनों  का यही संसार है बनता सहज़ जीवन आधार है ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ज़िन्दगी आसान नहीं फिर भी चलना होगा रहेंगी बात सदा याद मुझे अब बदलना होगा -------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- जाने क्याये  कह जाती है मुझसे यू  हवा रह रह कर कौन सी बात उठी सरे बाज़ा...

ज़िंदगी

 साभार गुगल मैं इंसान बन के  क्या जीती अधूरी बची ज़िंदगी उधार क्या देती आये वो दो बूंद बन कर बरस जाये होठ चुप है मगर मैं ख़ामोश नहीं होती राह कैसी भी थी चुपचाप चले वरना ज़िंदगी में तेरे ज़ीने कि वजह क्या होती मेरी मुट्ठी में सीप बंद रही तेरी फितरत यू सराब में अब कहाँ होती आराधना

गम

साभार गूगल यू ही मिटने के लिए और मिटाने के लिए हसरतें जां क्यू  रहेगी क्या तुझे पाने  के लिए मांगा क्या मिल गया उम्र निभाने के लिए यू ही एतरफ किये जा खुद को भुलाने के लिए अब भी मदहोश किय जा है आये तुझे पाने के लिए दिल में है यू ही वो जले गम -ए  यादों के लिए अब ये ग़फ़लत ही सही एक तुझे पाने के लिए कुछ ना कह सके हम उनको बताने के लिए माना मज़बूर मेरे  हालात  बहुत से  रहे होंगे "अना" आराधना            अना"  माने respectful use as pen name

हौसला

जो कहता है उसे कहने दे , वक़्त के दरिया में बहने दे , आज कहे तो हालत बदल दे मोजों को तो पल में बदल दे अँधेरा जब इतना बढ़ जायेगा सामने कुछ न नज़र आएगा सोच बन के जो  निखर जायेगा राहत-ए -वस्ल को वही पायेगा अपने वादों का जिसको कौल नहीं इमां भी उसका फिर ईमान नहीं इंसान ऐसा भी  अब क्या होगा जिसका रहबर  खुदा  नहीं होगा @आराधना कॉपी राइट  

मित्र के नाम पाती

चला काफिला ये अकेले -अकेले लो अंतिम विदाई  ये अंतिम समय कि परिणय का सूत्र ही प्रेम होता,नहीं सदा बात ,प्रणय कि ही होती नहीं है यहाँ कहते है के मित्र मिलते नहीं ह्रदय ने सुनी कहीं दूर से आवाज़      कैसी थी रात,उस अंधकार में  दुःख कि बातें बनी मित्र का साथ थी एक कि ,दूसरे कि वहीं मन कि बात थी जब दुख ने  दुख को आवाज़ दी आँसुओ को  भी पोंछा, और बात कि                साथ निरंतर तुम्ही ने बस दिया साथ दुख कि बात बनी सुख का आधार     ना था  कोई  बंधु कोई भी  बात साथी यहाँ ये कारवां अब  रुकेगा नहीं चलेगा सदा और  साथ रहेगा  सदा बात उसकी थी जिसने निभाई सदा   @  आराधना  कॉपी राइट मित्र के नाम पाती

हर लड़की

साभार गूगल इमेज सड़क पर चलती हर लड़की कहीं भी दिखी आदमी को मांस  का टुकड़ा  भर ही लगी देखा जिसने भी सिर्फ लड़की तुझे बस एक जिस्म   सा देखा औरत तू महज़ एक  खिलौना है तेरी सोच भी कुछ  तो रही होगी भागती भीड़ में कहीं तू भी यही दुःख के अहसास में भरी होगी काश जान पाता  हर कोई जिस्म से अलग  तू कोई जान  होगी एक ,मरियम सी सीता , सी  या रेहाना  सी किसी कि नज़रें क्यों हो वहशहना सी @ कॉपी राइट आराधना