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कवित -परंग


                                    कवित -परंग 



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बोल कोई मीठे कोई बोलता है
वही मन में कहीं समां जाता है
भाव विह्ल हो मूक हो जाते है ,
शब्द नए गढ़ जीवन  पाते  है
कोई  रूप रंग  में ढल जाते है
फिर भावों में सृजन पलता है
सुख सपनों  का यही संसार है
बनता सहज़ जीवन आधार है


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ज़िन्दगी आसान नहीं
फिर भी चलना होगा
रहेंगी बात सदा याद
मुझे अब बदलना होगा



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जाने क्याये  कह जाती है
मुझसे यू  हवा रह रह कर
कौन सी बात उठी सरे बाज़ार
कुछ कह ना सकी रह रह कर

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गीतों के मौसम में
साज़ बन के देखिये
नई इन उम्मीदों  की
परवाज़ फिर ये देखिये
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श्रद्धांजलि

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आना

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