Skip to main content

मित्र के नाम पाती



चला काफिला ये अकेले -अकेले
लो अंतिम विदाई  ये अंतिम समय कि
परिणय का सूत्र ही प्रेम होता,नहीं सदा
बात ,प्रणय कि ही होती नहीं है यहाँ
कहते है के मित्र मिलते नहीं
ह्रदय ने सुनी कहीं दूर से आवाज़     
कैसी थी रात,उस अंधकार में
 दुःख कि बातें बनी मित्र का साथ
थी एक कि ,दूसरे कि वहीं मन कि बात
थी जब दुख ने  दुख को आवाज़ दी
आँसुओ को  भी पोंछा, और बात कि               
साथ निरंतर तुम्ही ने बस दिया साथ
दुख कि बात बनी सुख का आधार   
 ना था  कोई  बंधु कोई भी  बात
साथी यहाँ ये कारवां अब  रुकेगा नहीं
चलेगा सदा और  साथ रहेगा  सदा
बात उसकी थी जिसने निभाई सदा
  @  आराधना  कॉपी राइट
मित्र के नाम पाती








Comments

Popular posts from this blog

कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"