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क्यू

            -------------------------------------------------        ज़ख़्म फिर से  दिल के हरे क्यू हो गए          वो जो कब तलक ही सूख जाने वाले थे          बरसों हम  उन के लिए क्यू जी लिए            अगर वो हम से रूठ के जाने वाले थे           मेरे क़ातिल को पता था मेरा भी मकां            उस से बच कर कब निकलने वाले थे            अजीब बात थी वो शख़्स भी सौदाई हुआ          कल तलक जिस बाज़ार में बिकने वाले थे  आराधना राय  ==================================

सौदा

                       ---------------------------------------------------- एक सौदा कर लिया है इश्क़ के बाज़ार में तेरे  नाम पर मरना जीना तेरे ही नाम पे तुम्हारी आदतों में मेरी आदतें भी शुमार है तेरी  आवाज़ में मेरी आवाज़  का ख़ुमार है ये मिरज़ -ए -इश्क़ है नाकामियों के नाम पे हम खुद आ कर रूक गए है एक तेरे नाम पे साथ तेरे यू चल पड़ा बस  क़ाफ़िला था नहीं हमसफ़र कोई कहाँ था "अरु" तन्हां ही सही आराधना राय

अलख जगाये

अलख जगाये  ====================== अपने नयन खुवायें आज पी ही  लुभाये सखी मुझे पी बुलाए  जिया मेरा क्यू हर्षाए  सोवत  जागत ही तुम संग जन्म ही बिताये ये जग बैरन है  साधु ड़ोर ही अब छूटी जाये आराधना *

आराधना * बाबा नागा अर्जुन और कबीर जी के जन्म विशेष पर

आराधना *  बाबा नागा अर्जुन और कबीर जी के जन्म विशेष पर  -------------------------------------------------------- नमन करुँ उस प्रवीण आत्मा को उससे उपजी गहरी सी साधना को दे रहे  कबीर भी अपनी ओज वाणी नागार्जुन जगा  रहे थे समाज वाणी समाज रहेगा सदा ही अनुग्रह ऋणी  हिंदी भाषा ने पाई थी  समृद्धि धनी  सूर्ये  भी यहाँ झुके नतमस्तस्क हो  कर्म पथ के वीर बात करते गंभीर  आराधना

बात

=============================================== बात है राज़ क्या यू  बताये अपना ये हकीकत है वो मानते है  सपना कौन कैसे जाने कब जी ही जाता है कौन मुक़दर को यू ही  आज़माता है मुझे साहिल कभी यू मिले ही नहीं समुंदर मैं डूबी यू ही चली जाती हूँ हम जिए या ना जीये तेरे अरमान में ज़िन्दगी अपनी रौ में बही ही जाती है कल का सामान बांध ले तू बस अभी आज कि रुखसती "अरु" हुई जाती है आराधना राय

पर्यावरण पर कविता .....धरती का दुःख

पर्यावरण पर  कविता धरती का दुःख …………………….............................................. वो बुरी शक्ल लिए मिलने आई थी हाथों मैं कटोरा भीख का ले आई थी रूखे -सूखे  केश लिए कहने आई थी आहात थी दुःख साथ ही ले आई थी आँखों में आँसू भर वो जब कराही थी दर्द कि आवाज़ नहीं सुनाने आई थी धरती थी अपनी पीड़ा बताने आई थी कौन सी त्रासदी उसे नहीं रास आई थी वृक्ष , वन , नदी सब का दर्द ले आई थी बात  किसी कि समझ  में नहीं आई थी प्रकृति का उपहास मनुज ने  उड़ाया था विपति उपहार स्वरुप घर ले  आया था जब धरा ने तीष्ण हथियार ही उठाया था हाय किस्मत ने भी तो बड़ा ही रुलाया था आदति जब श्रृंगार कर के स्वयं ही आई थी मनुज तूझे  बलात्कार क्यों रास आया था आराधना राय

वक़्त

वक़्त ---------------------------------------------------- जाते हुए वक़्त को मैं थाम नहीं सकती  क्यू  मुझे वो गुज़रा वक़्त याद आता है देख आये है इस  दुनियाँ भर के मेले को मेरा बचपन अभी तक ही मुझे रुलाता है किसकी उगली थी थाम कर चली कभी  तेरा साया था वो आज भी याद आता है थोड़ा सकून ज़िन्दगी तुझे  मिलता नहीं    दिन का शोर ही रातों में भी क्यू डराता है  मन ये पंछी कि तरह ही क्यू उड़ा जाता है जाने किस कि खोज  ये कहा को जाता है कितना पागल है कुछ समझ नहीं आता है  कौन किस के लिए यू लौट के आ  जाता  है  कह कर नहीं आता बेवक़्त ही आ जाता है  ये बुरा वक़्त "अरु" बता कर कहा आता  है  आराधना राय   

किसके लिए

वो जलाता रहा आँधियो में दिये ना जाने क्यों और किसके लिए एहसास अपने आप में कोई लिए वो चल रहा था जाने किसके लिए पैरों छाले और ज़ख़्म दिल में लिए वो भरता रहा बस औरों के ही किये वो मुरीद था तेरा ये ही बताने के लिए क्यों बैठा है वो यू  इस ज़माने के लिए आँख में आँसू का एक बस कतरा लिए चुप है बड़ी देर से "अरु"जाने किसके लिए

ज़िंदगी

एक शज़र ही काफ़ी है साया देने को  एक चिंगारी  बहुत है आग लगाने को  फिर  जाने क्यों गुलिस्तां जल जाते है  कितने ही काफ़िले मरघट तक जाते है  वो कौन है जो बस खुदा पा ही  जाते है  चन्द लम्हें ज़िन्दगी के जी ही जाते है   हमें ज़िंदगी लगती है सदी  मनाने को  आराधना राय 

वो फुटपाथ

वो फुटपाथ पर दिन भर सामान बेचती थी  रात भर जिस्म का वो भी बाज़ार देखती थी  इश्क़ के नाम पर वो पैगाम क्या भेजती थी  वहशियत का रोज़ वो इनाम खुद झेलती थी   हाथ -फैला  हर  रोज़ चन्द सिक्के देखती थी  अपने हाथ में वो क़िस्मत का नाम देखती थी  उम्र भर जाने किसकी वो क्यू राह देखती थी   जीने कि चाह में रोज़ ही मर कर वो देखती थी  नज़्म आराधना राय 

क्या पाओगे

आज हूँ तुम कल मुझे नहीं तुम पाओगे मेरी आवाज़ भी सुन नहीं तुम यू पाओगे दिल ही दिल में तुम भी खूब  पछताओगे मुझ को खोकर बता तुम यहाँ क्या पाओगे रूठ कर तुम भला क्या मुझ से दूर जाओगे ज़र्रे -ज़र्रे में मुझको ही तुम  बिखरा पाओगे उलझनें अपनी ही खुद तुम यू बढ़ा जाओगे हर जगह वीरान सी मेरे बगैर तुम पाओगे ना रो सकोगे तुम फिर ना यू मुस्कुरओगे दिल के टूटने कि आवाज़ ही सुन पाओगे मेरे ज़ख़्मों को कुरेद कर तुम क्या पाओगे मैं जो रोइ तो तुम भी तो अश्क़ बहाओगे नज़्म  .... आराधना राय

सुना मुझे

           सुना मुझे ------------------------------------------------- ज़िन्दगी कोई और कहानी  तू सुना मुझे भूख और प्यास कि बातें यू ना सुना मुझे मेरे  हालातों ने ही बहुत मार गिराया मुझे अपनी क्या बात यू  ही अब मैं बता दू तुझे मेरे रोने पर क्यों  ना कभी रोना आया उसे  मेरा हमदर्द था बाज़ार में ले आया वो मुझे अपने  हाथों में डोर बांध ले कर आया मुझे मैं उसकी कठपुतली हूँ ये बताने आया मुझे आराधना राय

गीत वहीं गाते हो

तुम गीत वहीं फिर गाते हो जो उर में आन समाता है उषा कि प्याली में रचे बसे रश्मि का दीप जलाता है, अपराह्न समय भानू वीर अग्नि सा बरस कर जाते है ग्रीष्म ऋतु से हिय में क्यों संताप प्रहार कर के जाते है निशा कि चादर को ओढ़े चंद्र मन ही मन मुस्काता है चपल चाँदनी कि आभा से स्निग्ध् स्नान जग पाता है निंद्रा कि बाहों में जब मंद समीर मन को बहलाता है तारों कि चुनरीया ओढ़े कोई स्वपन नए से दे जाता है गीत मुझे हर दिन ही दिवस रात्रि में भेद बतलाता है जाने वाले थोड़ा रुक जा दिन ही रीता सा जाता है आराधना राय    

ख़्वाब आँखों में

-------------------------------------------------------------- किस  कि आहट को सुन कर वो चले आते है ख़्वाब से हमारी आँखों में वो बसा कर जाते है कोई साज़ -ओ -सामान नहीं साथ वो लाते है दिल के आईने में बात कर के वो चले जाते है कोई शिकवा नहीं मुझसे उनको ये बता जाते है वो तस्वुर है मेरा मुझसे ही बात कर के जाते  है दिल के शहर के अफ़साने को बयां कर जाते  है तन्हा होते हुए भी अरु वो महफ़िल सजा जाते है आराधना राय 

ढूंढते रहे

ढूंढते रहे =============================== तेरी चाहत लिए ना जाने कहाँ यू घूमते  रहे मंज़िल कि तलाश में जाने क्या यू ढूंढ़ते रहे वादा नहीं तुझसे फिर सनम तुझे ढूंढते रहे बोझ कांधे उठा कर सदियों यू ही घूमते रहे रात दर्द की खामोशियों में तुझे क्यू ढूंढते रहे ख्वाब था फिर भी सिरहाने तुझे यू ही ढूंढते रहे किस कशमकश में थे क्यों ये बात पूछते ही रहे तेरे घर का पता किसी और से हम क्यू पूछते रहे तेरे बगैर ज़िन्दगी काटी और तुझे  भूलते ही रहे इसी सोच में जाने किस किस को खुदा बोलते रहे आराधना राय

गीत

गीत जानवर इंसानियत सीख जाएगा इंसान, इंसान भी नहीं बन पाएगा पत्थर भी एक दिन बोल कर जाएगा मानव तू भी पाषाण ह्रदय हो जाएगा संवेदना हीन वेदना क्या जान पाएगा कोई गीत यू ही अधूरा ही रह जाएगा अस्मां को क्या कोई यू झुका पाएगा हौसला है गर धरणी धीर कहलाएगा आराधना राय

सभ्यता के नाम

सभ्यता के नाम --------------------------------------- मेरे आँगन में भोर कि लालिमा छाई बिटिया तू जिस दिन घर में मेरे आई मलीन मुख पर क्रांति सी ले कर आई  मुझे लगा नन्ही परी मेरे घर पर आई अश्रुओं कि धार  किसी भी ने ना बहाई तू पूरे  घर को थी मन ही मन में सुहाई आज में दुनियाँ के रुख को देख घबराई तीरे किसने  सभ्यता के नाम के चलाये छींटा कसी देख़ बात ना समझ में आई क्यों परिधान कि बात यू हर घड़ी उठाई देखा नहीं महिला विश्व में सार्थक हो गई कहीं कल्पना ,कही एमली ,तो सैली राइड किरण अवतरित हो धूमिल नहीं हो पाई बेटी के अंतस कि बात क्या समझ  पाये जब किसी क्रांति में एक स्त्री दल होता है समाज भी जा के वही सगठित होता है जब कोई बेटे बेटी में अंतर नहीं पाता है स्त्री पुरुष के नाम कि दुहाई नहीं लगता है  नव किसलय विचारों का हनन नहीं होता वही समाज सभ्यता के गीत ही गा पाता है आराधना राय  

फूल

 जब फूल किसी ने यु चुराया होगा शाख पे क्या गुज़री जान पाया होगा वो उदासियों में मुस्कुराया तो होगा नाम उसके जब जुबां पर आया होगा कोई ना कोई किसी का हम ज़ुबां होगा किसी के अश्क का अरु कोई सिला होगा आराधना राय

मुमकिन ना हुआ

मुमकिन ना हुआ -----------------------------------------------                         वो मेरी बात को कभी समझा ना था वो आईना था मगर दरका हुआ सा  करुँ क्या बात मैं खुद अपनी ज़ुबाँ से  किसी कि आस में कब से बैठा हुआ था  वो मेरा था मगर मुझ से रूठा हुआ था जाने किस बात ने उसको रोका हुआ था  परस्तिश कर सकूँ उसको कब हुआ था  रिश्ता अहसास का जाने क्यों  हुआ था वो मेरे सामने कभी  यू आया ही नहीं था निगाहों से करें बातें  मुमकिन ना हुआ था उसकी मेरी बातें सामने ही कब हो सकी थी मेरी उसकी हर एक बात पसे दीवार हुई थी   आराधना राय ----------------------------------------- दरका -----चटका हुआ , पसे दीवार------------- दीवार के पीछे से। परस्तिश,,,,,,,,,,,,,,सज़दा , झुकना किसी के आगे Already published in vishwagatha 2015 jun