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दौर में

कविता ========================================== मैं अपने दिल में कुछ छिपा ना सकूँगी हार कर भी जीत के तुम्हे पा न सकूँगी कोई राज नहीं  तुम को ना बता सकूँगी उम्र बीती राह में बसेरा ना बना सकूँगी राहत -ए -दौर में मंज़िल न बन सकूँगी वक़्त आया तो दरिया बन चल सकूँगी   आराधना राय 

सरगम

छाया चित्रकार शिखर राय आँख का पानी कहु या मैं आँख का मोती लहराये ये बिंदु जल जब आद्र हुआ मन सपने थे तेर पर मेरी आँखों में है अब बंद साँसो में धड़केगी  यू ही ये सरगम हरदम आँखों में लहराता है मधुरिम सागर हरदम झिलमिल से सपनों पे पहरे है  अब  हरदम  आराधना राय

आग

सभ्यता का ये कैसा हुआ विकास है नर पशुता से कर रहा क्यों संहार है। सुनता नहीं कोई जब कोई पुकार है घायल होता तब यही हर  इंसान  है भूख से बेहाल यहाँ खुद किसान है भूमि बंज़र,ज़र्ज़र और हुई बेहाल है रोटी कि जगह भूख पकती क्यों है चूल्हें की आग ये  अब दिल में क्यू है आराधना

ना जाने क्या सोच कर

राह में कोई था ही नहीं अपना क्या  ये सोच कर  लोग हँसते रहे मेरी बर्बादी का काफिला देख कर  हर एक लम्हा गुज़र ही जायेगा जाने क्या सोच कर  ज़ख्म है भर जायेगे देने वाले ने दिए क्या देख कर  उसे अपना ही अहसास नहीं क्यों तुझे कुछ भी देगा   उसको हम दगा दे आये कब के जाने क्या सोच कर  वफ़ा पे इल्ज़ाम धरते रहे वो ना जाने क्या सोच कर   हम भी सितम सहते रहे क्यों ना जाने क्या सोच कर  आराधना 

जाने वाला

 मेरा रहबर है वो बताती रही  तेरे साथ जो था जाने वाला  तन्हाई ये कौन सी बाक़ी रही   दिल को जो था जोड़ने वाला  एक फ़क़त याद ही बाकी रही    उसकी तस्वीर ये बताती रही     हर शाम को जो लुभाती ही रही किसकी किस्मत थी बताती रही  नाज़ों नख़रे वो यू उठती ही रही  काँच सा दिल है बताती ही रही  मैं उम्र भर इंतज़ार ही करती रही  ले गया घर मेरा उठ के जाने वाला   आराधना  

परिचय

1994 मेँ हिंदी अकादमी द्वारा पुरस्कृत , मेरी सहेली नामक मैगज़ीन  मे कहानियाँ लिखी  नाटक   और कुछ रेडिओ प्रोग्रम्मेस  की स्क्रिप्ट लिखने के एक़ अन्तराल बाद दुबारा से हिंदी लेखन करने का दुःसाहस  कर रही हू । I write my English short story blog in  http:// aradhanakissekahniyan. blogspot.in/and  I write Hindi story as tulika and urdu nazm in devanagari script as a  

मात

मात ------------------------------------------------------------------------------------------ वक़्त के साथ हालत बदल जाते है लोग एक दिन सब को भूल जाते है एक हम है बातों को बताये जाते है तेरी यादों में दिन भी लुटाये जाते हैं तुझ पे एतबार क्यों हम किये जाते है बिना ही बात गम को क्यू पिये जाते है इस बहाने ज़िन्दगी हम जीये जाते है मात खुद को ही हम क्यों दिए जाते है आराधना

हो के उठ

छाया चित्र। शिखर राय सितम पर सितम उठा एक बार मुस्कुरा के उठ कोई फिर साज हसी उठा रोज़ फसाने दिल से उठा  साहिल से कश्ती तो उठा सागर  में  डूब  के  भी उठ   दिल -ए -दागदार से उठ ज़िंदगी में रवा हो के उठ  आराधना

साँझ

दूर कहीं किसी गाँव में डूबते हुए सूरज के साथ साँझ रुक सी  जाती  है पेड़ों से झाँकते पत्तों में  कुछ वह कह सी जाती है अंधेरों में मिलने से पहले अपने  में सिमट जाती है खामोशी के साथ आँखों से सब कुछ  कह कर जाती है पंछियो के कलरव पुकार से नए रंग रूप भर कर जाती है सपनों को आवाज़  दे जाती है सूरज के साथ विदा हो जाती है आराधना

नव नींव

साभार गुगल इमेज़ यू अलग -विलग हो जैसे नदी के दो तीर बीच में बह रहा जीवन शांत ,धीर ,गंभीर प्रणय कलापों से दूर कर्मों के वीर धरे मस्तक पर अपने  नित नई पीर ध्वस्त  हो जब आडंबर पड़े समाज कि नव नींव कितने कुचले रीति के नीचे हूए म्लान ,क्लांत नहीं राज्य तम का गहराये जब आलोकित हो दीप आराधना राय

उहापोस

रोज़ रोज़ कि उहापोस से मैं स्वयं  डरती हूँ  ताने -बाने से सपनों के  ही कही बुनती हूँ  समय कि चोरी होने भी घबराती  नहीं हूँ  लम्हा लम्हा सा ज़िन्दगी को बांधती हूँ  डर रही हूँ या मैं अपने में जीती जा  रही हूँ  यह भी नहीं अब तुझे बहलाना  चाहती  हूँ  खुल कर विरोध नहीं करती पूछती फिरती हूँ    अपनों पे मरना  अधिकारों से लड़ना जानती हूँ पराई पीर भी अब जी कर अभी यहाँ  जीवित रही   जिस के लिए मर कर जीना भी अब मैं जानती  हूँ  \ आराधना 

किसकी पुकार है

साभार गुगल इमेज़ इस गंदले उथले पानी में कुछ भी साफ़ नहीं है ठहरे पानी में किसकी परछाई नज़र आती है खुद को भी पहचानना भी तो  अब सरल नहीं है देख कर आत्मा भी यहाँ पर क्यों तड़पती नहीं है किसकी पुकार है  आवाज़ बन के उभरती रही  है कौन जाने वक्त ने यहाँ कैसी क्या चाल चली  है जंग लगे कितने  दिलों में  वो कौन से अरमान है जिन  के लिए चले जब राह ,में वो भी पास नहीं है रास्ते ही रास्ते है मंज़िल का भी अब पता नहीं है इससे आगे मेरे लिए भी क्या कहे जगह  नहीं  है आराधना

ज़िन्दगी मिलती है

साभार गूगल इमेज ज़िन्दगी ख्वाब के सहारे नहीं कटती है दरिया सी  बस कहीं बहती ही रहती है मन कि किताब पर गीत नए लिखती है सुनहले संसार के कुछ शब्द नए बुनती है प्रीत ही हो जीवन बस ये ही कहाँ कहती है आशा -निराशा के दोनों पल यही चुनती है  यथार्थ के  मैदानों पर सपनों सी पलती है आँखों कि किरकिरी बन कभी ये मिलती है आराधना 

भगवान भी मंदिरों में अब तक बिकता है

भगवान भी मंदिरों में अब तक बिकता  है दो रूपये में हर दरवाज़े बेमोल  मिलता  है कहने से भगवान भी कही पर दिखता   है मांगने पर भी तुझे कहीं  नहीं मिलता है पीड़ वहन करने पर सब  यही मिलता  है सह के घात- आघात  मनुज ये  बनता है आराधना
जिसे  ढूंढ़ते फिरे  दर -  बदर ना इधर मिले ना उधर मिला तू खयाल बन के समा रहा नूर के वज़ूद में  हर रूप में

कठोर धरातल

साभार गुगल इमेज  छूटे अब  सभी खिलौने  रूठा बचपन का संसार  हाथ क्या आया उनके  ये कागज़ का व्यापार  भीख मांगते उन  हाथों को  मिला जब अभाग्य अपार  नही किताबें संगी जिनकी   क्या उन्हें ना भाया प्यार  रही सदा फीकी ममता ही  ना मा और पिता का साथ लड़ा लड़कपन सड़कों सड़कों  लेकर भटके हाथ कटोर- दान  कठोर धरातल , मैला आँचल  क्या निभा पाया उन से संसार  दोष क्या देना उनका फिर भी  थे विधि के ये  सब क्रूर विधान  कभी -कही तो सब कुछ पाकर   जग में और करें बस  हाहाकार  आराधना 

हरे पेड़ पत्ते

साभार गुगल इमेज  हरे पेड़ पत्ते सुगन्धित वो कलियाँ बरसाते थे सावन रिमझिम से बादल अब धूमिल हुई क्यों तड़पती है धरती बची आस बाकी सूनी वसुधा कि न बसेगा पानी ऋण कैसे चुकेगा वीर किसानों का ना बरसा गर नीर जब ना पहनेंगी वसुंधरा चूनर धानी अब धूमिल परिवेश क्लांत  दुखी देश आराधना 

तुम पूछो

साभार गुगल इमेज़ क्या देखते है हो  अब इन नज़ारों में  जा के कभी  इन परिंदो से तुम  पूछो  भरी उड़ान दाने पानी कि जब उसने  गिरा क्यों कभी वो  सय्याद से पूछों   मुकम्मिल कौन सा अब जालिम है फ़साना जाके किसी और से भी पूछो मुसल्सल एक बात आकर रोक देती है बढ़ा के आस क्यों हाथ मेरा रोक लेती है आराधना