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हर लड़की

साभार गूगल इमेज सड़क पर चलती हर लड़की कहीं भी दिखी आदमी को मांस  का टुकड़ा  भर ही लगी देखा जिसने भी सिर्फ लड़की तुझे बस एक जिस्म   सा देखा औरत तू महज़ एक  खिलौना है तेरी सोच भी कुछ  तो रही होगी भागती भीड़ में कहीं तू भी यही दुःख के अहसास में भरी होगी काश जान पाता  हर कोई जिस्म से अलग  तू कोई जान  होगी एक ,मरियम सी सीता , सी  या रेहाना  सी किसी कि नज़रें क्यों हो वहशहना सी @ कॉपी राइट आराधना

गुलसिताँ

बुलबुले चहकती थी इसी बाग़ में गुलसिताँ जब महकने  ही लगा रूप, गंघ,रस के सुखी इस संसार में क्यू भागती दौड़ती थी ये  तितलियाँ प्रेम , प्रीत और नेह से थीजब पल्वित कुसुमित सदा नव हार से सुरभित सभी देखती है स्वप्न सुन्दर अब भी देखो  कहीं @कॉपी राइट आराधना  

आँख खुलने से पहले

आँख खुलने से पहले किसी दीदार से पहले आइना क्यू शरमाये हर वक़्त लगा तुम आये किसी का नाम लेकर  तुमने रो दिया होता बहूत था तेरा मिलना तेरा आना क्या कम था चले थे तीर और खंज़र  बिना ही बात  मारे मरे किसी कि आह में मरे किसी कि साँस में जिये 

फलक

उठे है खाक से हम तो फलक तेरे निशाने पे उन्हें भी फिक्र क्या अब इस नए फ़साने पे जुल्म -ए निशा  रहा है तू भी मेरे ठिकाने पे   देखे वादिये जां रूकती है अब किस ठिकाने पे सितम और जुल्म कि रह पे चलने वालो को बड़ी  नागवारिया गुजरी किसी  मरने वालो पे  तेरे भी दिल में  कोई खुदा कही तो  रहा होगा तेरा भी एक कही आशना यू भी तो रहा होगा  आराधना

नीड़

जंग लगी बेड़ियों का फिर ये हार क्यों ------------------------------- --- क्षुब्ध संचित जीवन पर अब ये  प्रहार क्यों --------------------------------------- भ्रमित हो चुके गान सारे नव प्रयाण क्यों  -------------------------------------- भोर कि इस लालिमा पर अश्रु धार क्यों ---------------------------------------  रंग विहीन जीवन पर अब ये श्रृंगार क्यों ----------------------------------------- नीड़ का तेरे मेरेअब  फिर निर्माण क्यों आराधना

शम्मा

शम्मा शोर तारी है , ज़ब्रे पे ये सोज़ -ए  सब्र क्यों है हम तो घिरे या लड़े अब यहाँ के  तूफानों से अभी तक होश है, जैसे भी है हम दीवानो में क़फ़स मैं हो के रहे या उडे हम आसमानों में शम्मा  जो जल रही कहीं यहाँ पे वीरानो में नूर ले आई कही से तू भी  इन आसमानों से हम तो मौत को भी जी जाते है फिर "अना" क्यों रुके हम यू ही कही बहते आबसारो  पे आराधना

शेष

शेष रही केवल आशाये   जो बनी कोमल भावनाए पँख ,पखेरू उड -उड़ जाये  साजन तुम क्यों नहीं आये वर्षा जल जब मेघ गिराये सब रस उर में ही बस जाये मधुर भावनाओं का परिहास वहाँ रहा  तेरा और मेरा  हास् जब मन की  पहचान नहीं थी बोलो अब किन नयनं कि आस सदा ना होती जग में  पूरी प्यास  जब प्राणों को प्राणों कि हो  आस रूप, रंग के इस नव यौवन पर ही   क्या यू ही चलेगा तेरा अभिसार और जगत के बढे बंधन पर भी चल पाया क्या ये सब कार्य व्यापार  आराधना @copyright
रात बहूत लम्बी है माना  किन्तू सुबह कि आस तो है। निपट अकेले संघर्षो  से हिम्मत अपने साथ तो है पग -पग में बाधा घेरे निश्चय विजय तेरे साथ ही है स्वयं समर्पित कर जीवन को देख सुबह तेरे साथ ही है।  @copyright                    आराधना

ज्योति -पुंज

 साभार गूगल इमेज ज्योति -पुंज को देखने  की क्षमता कहाँ , लोग तो केवल  ज्योति को पूजेंग। स्वभिमान कहाँ नयनों ये सब अभिमान को पूजेंगे दुनियाँ आवाज़ों  में केवल सुख को पूजेंगे पीर को ना देख कर केवल घात करेंगे फिर कैसी अब देखे बात करेंगे। आराधना blogger

जल रही है क्यों हृदय में ये चिताएँ

जल रही है क्यों हृदय में ये चिताएँ क्यों बनी पर्याय जीवन कि व्यथाए किसलिए है शोक से आक्रांत जीवन क्यों घुमडती है सदा ग़म कि घटाए हवन करते हाथ मेरे क्यों जले है क्यों अतिथि बन आ गई घर आपदाएं प्रश्न है सब से कोई उत्तर सुझाये किस जगह जा कर बसे मृदु भावनाए

धरती के सूखे कोनों में

बिन बादल बरसात ना होगी धरती के सूखे कोनों में दर्द कि कोई बात सी होंगी मन  के खाली पन्नों पे वो ही  मधुर मुस्कान खिलेंगी धरती,अम्बर  कि पलकों पे फिर नव श्रृंगार होगा सुसज्जित धरती के कोने कोने में आराधना छाया वाद  से प्रभावित रचना शुष्क रहे क्यों बने मलान जब जीवन होगा स्वर्ण विहान

अँधेरे

दिल में रोशन  है किये तेरी यादों के ये  दीये  गमे ग़फ़लत ही सही  एक तुझे पाने के लिए  हम को  आवाज़ तू  दे बस यू ही जीने के लिए हम अंधेरों में  रह  कर सितारों को देख  लगे     एक दिन रोशनी  खुद अंधेरों कि गवाही देगी स्याह रातो में जब  भी नुर कि भी बारिश होगी आराधना

1991 में छपी मेरी कविता

1991 में छपी मेरी कविता आराधना  सूर्य एक सत्य यह सूरज नित्य अस्त होता है तेज़स्वी होकर भी स्वेर्णाभा खोता है पूरी रात अँधेरे से लड़ता रहता है हर प्रात फिर फसल रोशनी कि बोता है दिन भर श्रम की प्राण -प्रतिष्ठा में रत रहता कालिख पोँछ रात कि जग का मुँह धोता है। यौवन आने पर जो प्रखर अग्नि बरसाता वह भी थक कर ढलता है छिपकर सोता है सूरज -सा ही जग में सबका यौवन ढलता व्यर्थ दर्प का भार सूर्य भी कब ढोता है शाश्वत नियम जगत का है आना और जाना हर दिन ढल कर भी सूर्य नहीं रोता है आओ हम सूरज सा करें स्वम को अर्पित देकर ही पाना जगत का समझौता है। आराधना 

रिश्ते बदल जाते है

साभार गूगल इमेज नज़्म सांसों के अहसास बदल जाते  है रिश्ते जब अपने से बदल जाते है खून की ज़ुबा जब खून बोलता नहीं रिश्ते भी ज़र्द और मंद पड़ जाते है  राह में मुसलसल  कहीं बह जाते है छूट कर बहूत आगे दूर चले जाते है सामने आते है तो बदल जाते है चेहरे कभी इंसा तो कभी खुदा  बन  जाते है आराधना 

हुजूम क्यू तारी

साभार गुगल इमेज हुजूम सड़कों पे क्यू आज तारी वक़्त -बे वक़्त भीड़ है क्यू  ज़ारी हाथ में मोमबत्ती लिए ये  साथ संवेदनाओं से उलझते हूए  हाथ राह में गर दिया होता कभी साथ यू न जलते ,उलझते ये सब साथ चीख , चीत्कार को जब सुन पाये  वक़्त पर साथ क्यू  ना तूम आये क्यों छिड़ी है जंग सड़कों पर आज क्यों किसी बात को ना समझ पाए नुचती रहेगी ,जलती बिखरती रहेंगी जब कहीं कभी भी कोई देगा ना साथ भीड़ कि आवाज़ भी ये उठती रहेंगी जब तक ना होगी कभी न्याय से बात आराधना http://aradhanakissekahaniyan.blogspot.in/

! कौशल !: संस्कृति रक्षण में महिला सहभागिता

! कौशल !: संस्कृति रक्षण में महिला सहभागिता हुजूम सड़कों पे क्यू आज तारी  वक़्त -बे वक़्त भीड़ हैक्यू  ज़ारी हाथ में मोमबत्ती लिए ये  साथ संवेदनाओं से उलझते हूए  हाथ राह में गर दिया होता कभी साथ यू न जलते ,उलझते ये सब साथ चीख , चीत्कार को जब सुन पाये  वक़्त पर साथ क्यू  ना तूम आये क्यों छिड़ी है जंग सड़कों पर आज क्यों किसी बात को ना समझ पाए नुचती रहेगी ,जलती बिखरती रहेंगी जब कहीं कभी भी कोई देगा ना साथ भीड़ कि आवाज़ भी ये उठती रहेंगी जब तक ना होगी कभी न्याय से बात आराधना http://aradhanakissekahaniyan.blogspot.in/

प्रार्थना

इमेज साभार गूगल साँझ हो गई है साईं तुम प्रकाश दो इस हारे मन को प्रभू तुम प्रकाश दो हो प्रलय कि मौन बेला गहन हो तिमिर थाम के निष्प्राण को तुम ही आस दो उदित हो जो नभ में वो चन्द्र हो तुम्हीं अंधकार भरे इस पथ का तुम प्रकाश हो मूल रचना आराधना

तेरे दर के पास।

साभार गूगल इमेज न गाड़ी न बगला न मोटर न कार कहीं एक मकां को तेरे दर के पास। हँसी खेलती हो मखमली  दूब पर खिलती हो कलियाँ कहीं  धूप पर। बरसती हो सावन की ठंडी फुहार झिलमल पानी कि कही से आवाज़। ना दिन कि ख़बर ना रात कि उदासी चले ए -खुदा अब तेरे  दर  के   पास।  आराधना    

सच जब मौन हो बोलता है

सच  जब  मौन  हो  बोलता है दीवारें ,आईने सब तोड़ता  है भूख कैसी भी हो मन को लगे आतंक का तांडव मुँह खोलता है बढ़ने लग जाता  धन का प्रभाव करने लग जाते लोग दुर्व्यवहार विप्लब  तब  ही  होते   है साकार जब मिल जाता उन्हें कोई आधार  सच को हर तराज़ू में ना यू तोलो नीलम कर यू बोलिया ना बोलो बिक गया होता गर सच भी कहीं  परिवर्तन होता भी तो कैसे होता    सच जब किसी के अंदर बोलता है किसी कि ज़िन्दगी को जोड़ता  है। आराधना

कहानी धरती अम्बर की

कहानी धरती अम्बर की       एक रोज़ जब अम्बर की  धरती से मुलाक़ात हूई।  मंद -मंद मुस्कान लिये    धरती को देख कर बोला,    थकती नहीं मुझे तकते हुए  बाहें फैलाये कब से खड़ा हूँ  तुम देखती नहीं हँसते हुए।  दो पल वो चुप रही फिर बोली  पेड़ नाचते है, फूल खिलते है   क्या देखा नहीं मुझे हँसते हुए  क्षितिज के पास अम्बर हंसा  हल्की सी फिर से  फ़ुहार  उड़ी।   तेरा मेरा फिर ये नाता क्या है उसने  हैरान  हो  फिर से  पूछा। ना जाने  कैसी  वो   बयार चली धरती कुछ  भी  ना  बोल  सकी।  मैं बंधी रही हूँ चाँद और सूरज से  तुम बंधे निशा ,संध्या , तारों  से  तुम जब बरसाते हो बादल अपने मेरे घर आँगन चमक से  जाते  है  तुम मुझे देख  कर  मुस्कुराते  हो मैं तुम्हे देख कर खुश हो जाती हूँ  नहीं जानती क्या है नाता तुम से  बंधू  ,सखा, सहोद...