Skip to main content

सच जब मौन हो बोलता है




सच  जब  मौन  हो  बोलता है
दीवारें ,आईने सब तोड़ता  है

भूख कैसी भी हो मन को लगे
आतंक का तांडव मुँह खोलता है

बढ़ने लग जाता  धन का प्रभाव
करने लग जाते लोग दुर्व्यवहार

विप्लब  तब  ही  होते   है साकार
जब मिल जाता उन्हें कोई आधार 

सच को हर तराज़ू में ना यू तोलो
नीलम कर यू बोलिया ना बोलो

बिक गया होता गर सच भी कहीं
 परिवर्तन होता भी तो कैसे होता   

सच जब किसी के अंदर बोलता है
किसी कि ज़िन्दगी को जोड़ता  है।

आराधना















Comments

Popular posts from this blog

कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"