Skip to main content

Posts

रात बहूत लम्बी है माना  किन्तू सुबह कि आस तो है। निपट अकेले संघर्षो  से हिम्मत अपने साथ तो है पग -पग में बाधा घेरे निश्चय विजय तेरे साथ ही है स्वयं समर्पित कर जीवन को देख सुबह तेरे साथ ही है।  @copyright                    आराधना

ज्योति -पुंज

 साभार गूगल इमेज ज्योति -पुंज को देखने  की क्षमता कहाँ , लोग तो केवल  ज्योति को पूजेंग। स्वभिमान कहाँ नयनों ये सब अभिमान को पूजेंगे दुनियाँ आवाज़ों  में केवल सुख को पूजेंगे पीर को ना देख कर केवल घात करेंगे फिर कैसी अब देखे बात करेंगे। आराधना blogger

जल रही है क्यों हृदय में ये चिताएँ

जल रही है क्यों हृदय में ये चिताएँ क्यों बनी पर्याय जीवन कि व्यथाए किसलिए है शोक से आक्रांत जीवन क्यों घुमडती है सदा ग़म कि घटाए हवन करते हाथ मेरे क्यों जले है क्यों अतिथि बन आ गई घर आपदाएं प्रश्न है सब से कोई उत्तर सुझाये किस जगह जा कर बसे मृदु भावनाए

धरती के सूखे कोनों में

बिन बादल बरसात ना होगी धरती के सूखे कोनों में दर्द कि कोई बात सी होंगी मन  के खाली पन्नों पे वो ही  मधुर मुस्कान खिलेंगी धरती,अम्बर  कि पलकों पे फिर नव श्रृंगार होगा सुसज्जित धरती के कोने कोने में आराधना छाया वाद  से प्रभावित रचना शुष्क रहे क्यों बने मलान जब जीवन होगा स्वर्ण विहान

अँधेरे

दिल में रोशन  है किये तेरी यादों के ये  दीये  गमे ग़फ़लत ही सही  एक तुझे पाने के लिए  हम को  आवाज़ तू  दे बस यू ही जीने के लिए हम अंधेरों में  रह  कर सितारों को देख  लगे     एक दिन रोशनी  खुद अंधेरों कि गवाही देगी स्याह रातो में जब  भी नुर कि भी बारिश होगी आराधना

1991 में छपी मेरी कविता

1991 में छपी मेरी कविता आराधना  सूर्य एक सत्य यह सूरज नित्य अस्त होता है तेज़स्वी होकर भी स्वेर्णाभा खोता है पूरी रात अँधेरे से लड़ता रहता है हर प्रात फिर फसल रोशनी कि बोता है दिन भर श्रम की प्राण -प्रतिष्ठा में रत रहता कालिख पोँछ रात कि जग का मुँह धोता है। यौवन आने पर जो प्रखर अग्नि बरसाता वह भी थक कर ढलता है छिपकर सोता है सूरज -सा ही जग में सबका यौवन ढलता व्यर्थ दर्प का भार सूर्य भी कब ढोता है शाश्वत नियम जगत का है आना और जाना हर दिन ढल कर भी सूर्य नहीं रोता है आओ हम सूरज सा करें स्वम को अर्पित देकर ही पाना जगत का समझौता है। आराधना 

रिश्ते बदल जाते है

साभार गूगल इमेज नज़्म सांसों के अहसास बदल जाते  है रिश्ते जब अपने से बदल जाते है खून की ज़ुबा जब खून बोलता नहीं रिश्ते भी ज़र्द और मंद पड़ जाते है  राह में मुसलसल  कहीं बह जाते है छूट कर बहूत आगे दूर चले जाते है सामने आते है तो बदल जाते है चेहरे कभी इंसा तो कभी खुदा  बन  जाते है आराधना 

हुजूम क्यू तारी

साभार गुगल इमेज हुजूम सड़कों पे क्यू आज तारी वक़्त -बे वक़्त भीड़ है क्यू  ज़ारी हाथ में मोमबत्ती लिए ये  साथ संवेदनाओं से उलझते हूए  हाथ राह में गर दिया होता कभी साथ यू न जलते ,उलझते ये सब साथ चीख , चीत्कार को जब सुन पाये  वक़्त पर साथ क्यू  ना तूम आये क्यों छिड़ी है जंग सड़कों पर आज क्यों किसी बात को ना समझ पाए नुचती रहेगी ,जलती बिखरती रहेंगी जब कहीं कभी भी कोई देगा ना साथ भीड़ कि आवाज़ भी ये उठती रहेंगी जब तक ना होगी कभी न्याय से बात आराधना http://aradhanakissekahaniyan.blogspot.in/

! कौशल !: संस्कृति रक्षण में महिला सहभागिता

! कौशल !: संस्कृति रक्षण में महिला सहभागिता हुजूम सड़कों पे क्यू आज तारी  वक़्त -बे वक़्त भीड़ हैक्यू  ज़ारी हाथ में मोमबत्ती लिए ये  साथ संवेदनाओं से उलझते हूए  हाथ राह में गर दिया होता कभी साथ यू न जलते ,उलझते ये सब साथ चीख , चीत्कार को जब सुन पाये  वक़्त पर साथ क्यू  ना तूम आये क्यों छिड़ी है जंग सड़कों पर आज क्यों किसी बात को ना समझ पाए नुचती रहेगी ,जलती बिखरती रहेंगी जब कहीं कभी भी कोई देगा ना साथ भीड़ कि आवाज़ भी ये उठती रहेंगी जब तक ना होगी कभी न्याय से बात आराधना http://aradhanakissekahaniyan.blogspot.in/

प्रार्थना

इमेज साभार गूगल साँझ हो गई है साईं तुम प्रकाश दो इस हारे मन को प्रभू तुम प्रकाश दो हो प्रलय कि मौन बेला गहन हो तिमिर थाम के निष्प्राण को तुम ही आस दो उदित हो जो नभ में वो चन्द्र हो तुम्हीं अंधकार भरे इस पथ का तुम प्रकाश हो मूल रचना आराधना

तेरे दर के पास।

साभार गूगल इमेज न गाड़ी न बगला न मोटर न कार कहीं एक मकां को तेरे दर के पास। हँसी खेलती हो मखमली  दूब पर खिलती हो कलियाँ कहीं  धूप पर। बरसती हो सावन की ठंडी फुहार झिलमल पानी कि कही से आवाज़। ना दिन कि ख़बर ना रात कि उदासी चले ए -खुदा अब तेरे  दर  के   पास।  आराधना    

सच जब मौन हो बोलता है

सच  जब  मौन  हो  बोलता है दीवारें ,आईने सब तोड़ता  है भूख कैसी भी हो मन को लगे आतंक का तांडव मुँह खोलता है बढ़ने लग जाता  धन का प्रभाव करने लग जाते लोग दुर्व्यवहार विप्लब  तब  ही  होते   है साकार जब मिल जाता उन्हें कोई आधार  सच को हर तराज़ू में ना यू तोलो नीलम कर यू बोलिया ना बोलो बिक गया होता गर सच भी कहीं  परिवर्तन होता भी तो कैसे होता    सच जब किसी के अंदर बोलता है किसी कि ज़िन्दगी को जोड़ता  है। आराधना

कहानी धरती अम्बर की

कहानी धरती अम्बर की       एक रोज़ जब अम्बर की  धरती से मुलाक़ात हूई।  मंद -मंद मुस्कान लिये    धरती को देख कर बोला,    थकती नहीं मुझे तकते हुए  बाहें फैलाये कब से खड़ा हूँ  तुम देखती नहीं हँसते हुए।  दो पल वो चुप रही फिर बोली  पेड़ नाचते है, फूल खिलते है   क्या देखा नहीं मुझे हँसते हुए  क्षितिज के पास अम्बर हंसा  हल्की सी फिर से  फ़ुहार  उड़ी।   तेरा मेरा फिर ये नाता क्या है उसने  हैरान  हो  फिर से  पूछा। ना जाने  कैसी  वो   बयार चली धरती कुछ  भी  ना  बोल  सकी।  मैं बंधी रही हूँ चाँद और सूरज से  तुम बंधे निशा ,संध्या , तारों  से  तुम जब बरसाते हो बादल अपने मेरे घर आँगन चमक से  जाते  है  तुम मुझे देख  कर  मुस्कुराते  हो मैं तुम्हे देख कर खुश हो जाती हूँ  नहीं जानती क्या है नाता तुम से  बंधू  ,सखा, सहोद...

निपट लूँगी।

  सुबह होने से  पहले  ही  मैं अंधेरो से निपट लूँगी। मेरे दर के तूफानों सुनो  मैं तुम से भी निपट लूँगी।  ना करा  अहसास   मुझे  तू अपने खुदा  होने  का।  ये  अलग  बात  है  मेरी  कल  तुझसे निपट लूँगी।  आराधना                                

पीली पत्तियाँ

आते जाते सौरभ ,सुगंध से मन के कुछ वातायन खुले हरी भरी इस फुलवारी में नित नए पल्लव हार खिले सरल नहीं यू फुलवारी में रोज ही मुक्ता हार मिले कंटकों को ही अपना कर  पुष्पों का ये वरदान मिले झरझर गिरते अश्रु से ही सींची थी ये मैंने फुलवारी अपनी -अपनी कह कर ही प्रेम -सुधा  सब बरसा डाला इतने पर भी संतुष्ट नहीं मैं अन्तस से पुछू ये ही हर बार इतना सब होने पर अबतक  क्यू प्रेम का काव्य रचा नहीं झड़ते पत्ते हंस कर यू बोले क्यों स्नेह मृत्यु से  करा नहीं मिटना ,बनना विधि तलक था पर उसने जब हार ना थी मानी फिर क्यू  इतना तू  इतराती है तू  है इतनी  क्यों री  अभिमानी मैंने केवल सुख का, व्यापार किया दुःख ,दुविधा से दूर रही जब में किसका ,कब कैसे उद्धार किया चली सदा ही  निज  की चाहत में औरो का कब मैंने सम्मान किया देखा है रवि को क्या यू  बस रोते फूलों ने फिर से नव झंकार किया नव किसलय को सहला कर बस पत्तों ने  सह...

नज़्म बेवज़ह नहीं

कोई वादा नहीं फिर भी क्यू  तेरा इंतज़ार करती हूँ अपनी तन्हाइयों में अक्सर दिल कि बात करती  हूँ। बेवज़ह तो नहीं ये सब बातें,या  यू ही बेक़रार रहती हूँ जाते हुये से इस पल में ,नींद से ख़्वाब क्यू मैं  चुनती हूँ। कोई सुन ले ना ज़बां से बस उफ ,होठो को सिये रहती हूँ चुप हूँ ख़ामोश हूँ मैं ,अपनी आँखों से ही मैं बात करती हूँ। आराधना

इकरार

वो बच गया सौ-सौ ख़ून कर के भी हम ही  तड़पे   इकरार कर के भी। न कोई  शिकवा ना कोई  गिला था  जो मिला  था नसीब से ही मिला था तुम्हारी पेशानियों  पर, जो सलवटे हैं मेरी ही सोच के ये सब  सिल-सिले  है तुम्हारी बातें मेरी ज़हन को लुभाती है मेरी हर सोच में  कहीं बस से गये  हो गज़ब सी दांस्ता मेरी अजब आरजू है न बन सकी कभी , न बिगाड़ी गई  है। हर एक बात उसकी कुछ लाज़मी सी  थी अंदाज़ भी बड़ा हीं उसका आशिक़ाना था यही हर बार हंस कर सोचते क्यों "अना" जो कल तलक अपना था आज बेगाना  है     आराधना ''अना''संक्षिप्त नाम का  उर्दू में अना का मतलब है    self-respect 

हाल -ए दिल

हाल -ए दिल --------------------- तुझ से रूठी हुई हूँ आओ माना लो मुझको दूर से ही सही आवाज़, लगा लो मुझको हाल -ए दिल पूछते हो गैर से क्या दिल धड़कने का सबब तेरे कोई और है क्या दो घड़ी का है सफ़र मुझको बताता है कोई साथ फिर कैसे रहेगा ,मुझको बताता है कोई खुद से ग़मगीन नहीं ,तुझ से मुतमईन नहीं मै ज़फा ना कर सकी तेरी वफाओं से कभी आराधना

नहीं जानती हूँ।

अभी मैं लिखना नहीं जानती हूँ , ख़्वाब बुनती हूँ मन के धागों से जिसे सिलना भी नहीं जानती हूँ , कोई ओस की बूंद  हाथ में आई, मानो शबनमी  धूप में फिर  हो नहाई। क्या कहू  ज़ज़्बात कि ही मानती हूँ, अभी तो मैं लिखना भी नहीं जानती  हूँ। कोई मीठी सी बात होठो पे आकर मुस्कुराई, उसे तो मैं अभी  जीना भी नहीं जानती हूँ। आराधना

कारोबार किया।

सुख -सपनों कि राह ही  छोड़ कर बस दुःख  का ही कारोबार किया। मूक हो चूके जिनके सब  स्वर ही बस उनका ही गुणगान किया। भला -बुरा सोचा ही कब किसने सत्य समर्पण बारम्बार किया। लेना -देना ही  जिनकी थी  नियत रीते हाथ  से  प्रेम व्यवहार किया। सुख -सपनों कि  राह ही   छोड़ कर बस दुःख का ही कारोबार  किया। आराधना