Skip to main content

Posts

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में लग गई आग सारे जमाने में लगेगी सदिया रूठो को मानने में अजब सी बात है ये दिल के फसाने में उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में आराधना राय 

नज़्म

रोज़ मिलती है सरे शाम बहाना लेकर जेसे अँधेरे में उजालों का फसाना लेकर चाँद के पास से चाँदनी का खजाना लेकर मुझको अनमोल सा एक नजराना देकर मेरा दर दर नहीं कुछ नहीं है क्या उसका जब भी मिलती है यही एक उलहना लेकर रात भर कितने आबशार बहा के जाती है पर वो जाती है तो किस्मत का बहाना लेकर - आराधना राय 

नज़्म

 उम्र के पहले अहसास सा कुछ लगता है वो जो हंस दे तो रात को  दिन लगता है उसकी बातों का नशा आज वही लगता है चिलमनों की कैद में वो  जुदा  सा लगता है उसकी मुट्टी में सुबह बंद है शबनम की तरह फिर भी बेजार जमाना उसे लगता है आराधना
रिश्ता पक्का है -----------------------------------------------------------------------------------------------  धारावाहिक का उद्देश्य— “रिश्ता पक्का है” कई अलग-अलग कहानियों को पेश करेगा l इसके साथ मीठा और खट्टा अनुभव कहानी के माध्यम से लोगों  के मन को गुदगुदा जाएगा l ------------------------------------------------------------------------------------------------                          पात्र – परिचय लड़का --- दिनेश   (ऑफिस में अकाउंटेंट) लडके का पिता श्री सतीश बहल --  (पेशे से टीचर) लडके कि माँ शशिबाला ---------    (गृहणी) लड़के का छोटा भाई ------------ वरुण लडके की बहन-------------------- कल्पना रिश्ता करवाने वाला व्यक्ति---- शास्त्री जी लडकी का परिवार लड़की – संजना लडकी  की बहन – रंजना लडकी का भाई – प्रवेश मालिक लड़की की भाभी- कृतिका लड़की के पिता- डॉ आशीष मालिक लड़की की माँ गृहणी-...

दो शेर

दो शेर वो जिधर  निकला काम कर निकला वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला

नज़्म

सोचता , हूँ तेरे बाद मेरा क्या होगा आसमा के नज़रो का क्या होगा मैने हर हाल में निभाया है तुझसे मेरे बिन भी हाल तेरा क्या होगा छोड़ दिया जहां जो अख्तियार में था मेरी दुनिया तेरी दुनिया के बीच क्या होगा रोशनी चाँद सितारों की उम्र भर के लिए तुमने नाता जोड़ा सितारों से तो क्या होगा ----------अरु

तू

तेरी गली से मेरा आना जाना है देखने का तुझे फकत बहाना है हम ही टूटे है अपनी जगह से अभी टूटे तारों का तो बस एक फसाना है तेरी बातों का सब भ्रम हट गया  मेरा अब ना यहाँ कोई ठिकाना है तू मिली तो एक सुबह की तरह तेरा आना मेरे लिए नज़राना है अरु 

नज्म

उम्र भर के निशा ढूंढते है ऐ - सहर हम तुझे ढूंढते है तू सितारा है आसमा का  दर -ब -डर हम तुझे ढूंढते है तू है सागर में भी हु नदिया तेरे कदमो में पनाह ढूंढते है राते कितनी भी हो गई काली एक उजाले को हम ढूंढते है ---------------अरु

क्यों है-

उसकी हाथों की कलाई याद आती है रेशमी चूड़ियों की खनक बताती थी आज निगाह में फिर सवाल क्यों है कुछ न हो कर तेरे मेरे बीच बात क्यों है ऱोज कुछ कहने की अजब सी चाहत क्यों है जो नही है उसका भ्रम आज तक मुझे क्यों है इंतजार कल भी था इन नजरों तेरे आने का रोज़ रूठी हुई तकदीर के सहारे ये दिल क्यों है------अरु

लधु -कथा

 जीत जंगल के अधिकारीयों से बच बचा के मगरू ने आज हिरन के झुण्ड पर घात लगाने की ठानी थी । किस्मत भी मगरू के साथ थी । हिरन का झुण्ड मगरू के समाने आ गया देख भाल कर मगरू ने घात हिरन के छोने पर लगाई , पर आखिरी पल में हिरनी मगरू और उसके भाले के बीच आ गई , छोटा बच्चा भाग कर अपने झुण्ड में जा मिला । मगरू की आँखों में जीत की चमक थी ,घायल हिरनी अपनी बड़ी - बड़ी आँखों से मगरू को देख रही थी , अगर वो बोल सकती यही बोलती की जीत एक माँ की हुई थी जिसने अपने प्राण दे कर आज अपने बच्चे को झुण्ड में सुरक्षित कर भेज़ दिया था । आराधना राय अरु
देख कर आए है दुनियाँ सारी ना वो दर रहा ना वो घर रहा आँधियों  का डर नहीं था धरोंदे को मेरा दिल ही हादसों के नज़र रहा तोड़ दी कमर मेरी गरीबी ने मै जहां रहा  बे शज़र रहा आ गए याद मुझे चहरे पुराने उन्ही के नगर बे डगर रहा अरु
आज बिरज की नगरी मैं होगा शोर नाचे जहाँ सब के मन के मोर रे चैत नेह बरसा रहा हँसे बदरा घनघोर चुप क्यों खड़े हो बसी बाजियां चितचोर रे
आज़ाद नज़्म पेड़ कब मेरा साया बन सके धुप के धर मुझे  विरासत  में मिले आफताब पाने की चाहत में नजाने  कितने ज़ख्म मिले एक तू गर नहीं  होता फर्क किस्मत में भला क्या होता मेरे हिस्से में आँसू थे लिखे तेरे हिस्से में मेहताब मिले एक लिबास डाल के बरसो चले एक दर्द ओढ़ ना जाने कैसे जिए ना दिल होता तो दर्द भी ना होता एक कज़ा लेके हम चलते चले ----- आराधना  राय कज़ा ---- सज़ा -- आफताब -- सूरज ---मेहताब --- चाँद

नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते  इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते  दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते  कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते  आराधना राय 

नज्म

नज्म हाल उनको भी पता है जमाने का नही यह काम उनको कुछ बताने का खुद ही तोड़ दी अपनी हमने अना यह खेल नहीं सनम उनको मनाने का कभी तो लब पे मेरा नाम लेते वो हमें काम नहीं कुछ उन को जताने का मेरे इकरार पर उनका इसरार होगा जब तभी तो बात बनेगी रिश्ता निभाने का आराधना राय 

अतुकांत

धुप के गावं में है बसेरा मेरा हर साया है मेरा हम साया मेरा बागवा को ना  कभी भरमाइए रंग रूप चेहरा मुक्मिल है सब का यहाँ रोज़ बातों से मेरा दिल यूँ ना बहलाइए ये दीवानगी मेरी कभी जाची नहीं इस पर अपना मुल्लाम्मा ना चढ़ाइए आराधना राय

वो

दुखों  कि  गठरी  बांध  कर वो  मेरे  घर  आता  है हँसता  है  मुस्कुराता  है अपनी  नम  आँखे  लिए वापस  लौट  जाता  है कैसे  कहे  वो  दर्द  सीने  के अपना  हर  रिश्ता  आज़माता  है किसे  दर्द  कह दे  किसी  के  नाम लिख  दे वह अपने  रंज  पर  बस ठहाके  लगता  है खामोश हो  सब  सह  लेगा  या दर्द का दरिया  बन  जायेगा एक  ना  एक  दिन  वो  समंदर  सा अपना सब  दर्द  सह  जायेगा आराधना

नज्म याद आता है

साभार गुगल सुबह होते ही तू याद आता है ए जालिम तू कितना सताता है ना मिला वो कोई रंज नहीं उसका दुख रह रह के बताता है यूँ तो मेरा वो लगता कोई नहीं  उसका मेरा सदियों का नाता है ना मिला वो कोई रंज नहीं उसका दुख रह रह के बताता है आराधना राय

नज्म

ना तेरे साथ जिया ना तेरे साथ मरा ए चश्मेतर मरा तेरे इक वादे पर मरा कोई दामन हवा में लहराता हुआ चला एक दिल था तेरे वादा ए इकरार पर मरा जहन के लाखो अँधेरे एक तेरे नूर पर मरे  अकेला दिल था, तेरे लबओ रुखसार पर मरा नीद आती तो थोडा सा सो लेते हम तेरे दामन् पे जीते जी ना लगता जैसे आज फिर कोई तस्वुर मरा आराधना राय

बंधन

साभार गुगल कविता कुछ प्रीत लिए कुछ रीत लिए बंधन जो तुमने बांधे है कैसे कह दूँ तेरे मेरे जीवन की साँझ हुई मौसम की हवाओं का क्या कहना ये तो बस आती जाती है मेरे जीवन की बगिया में सावन की बरसात बन कर आती है तूम हाँ कह दो तो सुबह हुई तेरे इक ना पे जान निकल सी जाती है आराधना राय अरु