Skip to main content
आज़ाद नज़्म
पेड़ कब मेरा साया बन सके
धुप के धर मुझे  विरासत  में मिले
आफताब पाने की चाहत में
नजाने  कितने ज़ख्म मिले
एक तू गर नहीं  होता
फर्क किस्मत में भला क्या होता
मेरे हिस्से में आँसू थे लिखे
तेरे हिस्से में मेहताब मिले
एक लिबास डाल के बरसो चले
एक दर्द ओढ़ ना जाने कैसे जिए
ना दिल होता तो दर्द भी ना होता
एक कज़ा लेके हम चलते चले -----
आराधना  राय
कज़ा ---- सज़ा -- आफताब -- सूरज ---मेहताब --- चाँद

Comments

Popular posts from this blog

कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"