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लधु -कथा

 जीत
जंगल के अधिकारीयों से बच बचा के मगरू ने आज हिरन के झुण्ड पर घात लगाने की ठानी थी । किस्मत भी मगरू के साथ थी । हिरन का झुण्ड मगरू के समाने आ गया देख भाल कर मगरू ने घात हिरन के छोने पर लगाई , पर आखिरी पल में हिरनी मगरू और उसके भाले के बीच आ गई , छोटा बच्चा भाग कर अपने झुण्ड में जा मिला । मगरू की आँखों में जीत की चमक थी ,घायल हिरनी अपनी बड़ी - बड़ी आँखों से मगरू को देख रही थी , अगर वो बोल सकती यही बोलती की जीत एक माँ की हुई थी जिसने अपने प्राण दे कर आज अपने बच्चे को झुण्ड में सुरक्षित कर भेज़ दिया था ।
आराधना राय अरु

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"