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जीवन - संबंध

साभार गुगल इमेज़ ---------------------------------------------------- सितारें ज़मीं पर ठहर गये होते, तेरे पास ही कहीं रह गये  होते  देखने  वाले जो ठहर गये होते  नज़ारे जो नज़ारे रह गये होते तुम्हे सोच कर जीते और मरते है  आसमां तेरे रंग मुझ ही में ढ़लते है  आराधना राय

कोई

जाने क्या ये सोच कर वो है बस मेरी मंज़िल   तकदीर बनकर नज़र आता है वो फ़िर  कोई थोड़े गम और सुख उस में रोज़ यू ही देकर    चाहने वाला चला आता है हर बार जाने कोई  हम तो मरते रहे है तन्हा इसी ख़ामोशी से ज़िंदा हूँ याद दिलाता है जाने हर बार कोई दिया जलता है रात भर खामोशियों में कोई आंधियों ने कसर ना छोड़ी इस  बार कोई कॉपी राइट @आराधना राय

मीत

मेरे मीत आवाज़ तू  देता है  ख़्वाब कि बात नहीं कहता है  सपनें से आँखों में टूट जाते है  किर्चियाँ चुभ कर रह जाती है  अश्क़ के साथ लहू मिलता है  दिल तो मोम सा पिधलता है  सपनों के साथ भी मिलता है  वक़्त जाने कैसे ये गुज़रता  है  तुम  से अहसास का रिश्ता है  ये थो दिल कि दिल से बात है   कॉपी राइट @आराधना राय 

अब पाऊँगी

साभार गुगल इमेज़ चाहू तुम्हे तो भी भूल ना  पाऊँगी दिल की आवाज़ बन तुम्हें पाऊँगी। यू ही कभी करार नहीं अब पाऊँगी चाँदनी रातें क्या भूल अब जाऊँगी दिल के धड़कने का राज़ कह पाऊँगी अब तुम को क्या भूल  नहीं   पाऊँगी धीरे से तेरा अहसास बन के आऊँगी अपनी तक़दीर में तुझे ही बसाऊँगी कॉपी राइट@आराधना राय

मुक़ाम

साभार गुगल इमेज़ फसल-ए -बहार में ये भी एक मुक़ाम आया है रास्ता में  देख कर  वो हम  से भी शरमाया  है उसका  वज़ूद शायद मेरी तलाश में आया है ख्वाबों में फिर तुझे कहीं कोई फिर भरमाया हैं रहा यू  वो दूर हमसे क्यों किसे समझ आया है उसकी ख़ता क्या  कोई समझ भी नहीं पाया  है किसका ख्याल यहा किसे ढूंढ  कर उसे ले आया है वक़्त ने इस तरह उसे क्यों किस बात पे रुलाया है आराधना

वरदान

अब के प्रभु रखियो  भी तुम मेरा मान काँटों के संग चल कर हँसू रख ध्यान  उपजे सब के मन में सुख पूर्ण  ज्ञान करे सब अपने निज, औरों का सम्मान पूरित हो सपनों का अपना अब वरदान फले -फूले हम दे सदा बस यही तू  दान आराधना 

मीत

    मीत    तू फिर लिख नए गीत जो मन बसे लोगों कि पीड़ ना हो तेरी ना हो मेरी बनाओ एक  सुन्दर फिर तस्वीर बीते जमाने भूल भी तुम जाओ लिखों नई तुम फिर तकदीर बन के नए तुम मीत आराधना

प्रेम की साथी

साभार गुगल इमेज़  प्रेम की  साथी  दीये कि बाती  जल कर देती   तू  उजियाला   मन के अंधियारे से निकला पुँज नव  जीवन की जग मगाई ज्योति आराधना   दीप की ज्वाला  मोती कि माला 

प्रीत

प्रीत प्रेम का अटल शाश्वत रूप यही पाया शबरी के बेर प्रभू तू  ग्रहण कर आया मीरा कि प्रीत भी दीवानी सी कर पाया कृष्ण  रूप में प्रभू ही प्रीत सीखने आया नयन का सुख छीन क्या जगत कर पाया प्रभू कि प्रीत लिखने सूरदास रूप ही आया आराधना    

बातें नहीं होती

दिल कि धड़कन भी कभी जुदा नहीं होती तेरी याद भी मुझसे क्यों विदा नहीं होती सोच तेरे बिन मेरी खुशी खुशी नहीं होती हर लम्हा जी मैं तुम से अलग नहीं होती गुज़रते वक़्त के साथ यू कहानी नहीं होती मीरा इस तरह भी कभी दीवानी  नहीं होती रूहानी प्यार कि फिर बातें कभी नहीं होती बिछड़ के मिलने कि बातें  कभी नहीं  होती आराधना राय    

दौर में

कविता ========================================== मैं अपने दिल में कुछ छिपा ना सकूँगी हार कर भी जीत के तुम्हे पा न सकूँगी कोई राज नहीं  तुम को ना बता सकूँगी उम्र बीती राह में बसेरा ना बना सकूँगी राहत -ए -दौर में मंज़िल न बन सकूँगी वक़्त आया तो दरिया बन चल सकूँगी   आराधना राय 

सरगम

छाया चित्रकार शिखर राय आँख का पानी कहु या मैं आँख का मोती लहराये ये बिंदु जल जब आद्र हुआ मन सपने थे तेर पर मेरी आँखों में है अब बंद साँसो में धड़केगी  यू ही ये सरगम हरदम आँखों में लहराता है मधुरिम सागर हरदम झिलमिल से सपनों पे पहरे है  अब  हरदम  आराधना राय

आग

सभ्यता का ये कैसा हुआ विकास है नर पशुता से कर रहा क्यों संहार है। सुनता नहीं कोई जब कोई पुकार है घायल होता तब यही हर  इंसान  है भूख से बेहाल यहाँ खुद किसान है भूमि बंज़र,ज़र्ज़र और हुई बेहाल है रोटी कि जगह भूख पकती क्यों है चूल्हें की आग ये  अब दिल में क्यू है आराधना

ना जाने क्या सोच कर

राह में कोई था ही नहीं अपना क्या  ये सोच कर  लोग हँसते रहे मेरी बर्बादी का काफिला देख कर  हर एक लम्हा गुज़र ही जायेगा जाने क्या सोच कर  ज़ख्म है भर जायेगे देने वाले ने दिए क्या देख कर  उसे अपना ही अहसास नहीं क्यों तुझे कुछ भी देगा   उसको हम दगा दे आये कब के जाने क्या सोच कर  वफ़ा पे इल्ज़ाम धरते रहे वो ना जाने क्या सोच कर   हम भी सितम सहते रहे क्यों ना जाने क्या सोच कर  आराधना 

जाने वाला

 मेरा रहबर है वो बताती रही  तेरे साथ जो था जाने वाला  तन्हाई ये कौन सी बाक़ी रही   दिल को जो था जोड़ने वाला  एक फ़क़त याद ही बाकी रही    उसकी तस्वीर ये बताती रही     हर शाम को जो लुभाती ही रही किसकी किस्मत थी बताती रही  नाज़ों नख़रे वो यू उठती ही रही  काँच सा दिल है बताती ही रही  मैं उम्र भर इंतज़ार ही करती रही  ले गया घर मेरा उठ के जाने वाला   आराधना  

परिचय

1994 मेँ हिंदी अकादमी द्वारा पुरस्कृत , मेरी सहेली नामक मैगज़ीन  मे कहानियाँ लिखी  नाटक   और कुछ रेडिओ प्रोग्रम्मेस  की स्क्रिप्ट लिखने के एक़ अन्तराल बाद दुबारा से हिंदी लेखन करने का दुःसाहस  कर रही हू । I write my English short story blog in  http:// aradhanakissekahniyan. blogspot.in/and  I write Hindi story as tulika and urdu nazm in devanagari script as a  

मात

मात ------------------------------------------------------------------------------------------ वक़्त के साथ हालत बदल जाते है लोग एक दिन सब को भूल जाते है एक हम है बातों को बताये जाते है तेरी यादों में दिन भी लुटाये जाते हैं तुझ पे एतबार क्यों हम किये जाते है बिना ही बात गम को क्यू पिये जाते है इस बहाने ज़िन्दगी हम जीये जाते है मात खुद को ही हम क्यों दिए जाते है आराधना

हो के उठ

छाया चित्र। शिखर राय सितम पर सितम उठा एक बार मुस्कुरा के उठ कोई फिर साज हसी उठा रोज़ फसाने दिल से उठा  साहिल से कश्ती तो उठा सागर  में  डूब  के  भी उठ   दिल -ए -दागदार से उठ ज़िंदगी में रवा हो के उठ  आराधना

साँझ

दूर कहीं किसी गाँव में डूबते हुए सूरज के साथ साँझ रुक सी  जाती  है पेड़ों से झाँकते पत्तों में  कुछ वह कह सी जाती है अंधेरों में मिलने से पहले अपने  में सिमट जाती है खामोशी के साथ आँखों से सब कुछ  कह कर जाती है पंछियो के कलरव पुकार से नए रंग रूप भर कर जाती है सपनों को आवाज़  दे जाती है सूरज के साथ विदा हो जाती है आराधना

नव नींव

साभार गुगल इमेज़ यू अलग -विलग हो जैसे नदी के दो तीर बीच में बह रहा जीवन शांत ,धीर ,गंभीर प्रणय कलापों से दूर कर्मों के वीर धरे मस्तक पर अपने  नित नई पीर ध्वस्त  हो जब आडंबर पड़े समाज कि नव नींव कितने कुचले रीति के नीचे हूए म्लान ,क्लांत नहीं राज्य तम का गहराये जब आलोकित हो दीप आराधना राय