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मुक़ाम




साभार गुगल इमेज़

फसल-ए -बहार में ये भी एक मुक़ाम आया है
रास्ता में  देख कर  वो हम  से भी शरमाया  है

उसका  वज़ूद शायद मेरी तलाश में आया है
ख्वाबों में फिर तुझे कहीं कोई फिर भरमाया हैं

रहा यू  वो दूर हमसे क्यों किसे समझ आया है
उसकी ख़ता क्या  कोई समझ भी नहीं पाया  है

किसका ख्याल यहा किसे ढूंढ  कर उसे ले आया है
वक़्त ने इस तरह उसे क्यों किस बात पे रुलाया है


आराधना




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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))