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कहानी धरती अम्बर की

कहानी धरती अम्बर की       एक रोज़ जब अम्बर की  धरती से मुलाक़ात हूई।  मंद -मंद मुस्कान लिये    धरती को देख कर बोला,    थकती नहीं मुझे तकते हुए  बाहें फैलाये कब से खड़ा हूँ  तुम देखती नहीं हँसते हुए।  दो पल वो चुप रही फिर बोली  पेड़ नाचते है, फूल खिलते है   क्या देखा नहीं मुझे हँसते हुए  क्षितिज के पास अम्बर हंसा  हल्की सी फिर से  फ़ुहार  उड़ी।   तेरा मेरा फिर ये नाता क्या है उसने  हैरान  हो  फिर से  पूछा। ना जाने  कैसी  वो   बयार चली धरती कुछ  भी  ना  बोल  सकी।  मैं बंधी रही हूँ चाँद और सूरज से  तुम बंधे निशा ,संध्या , तारों  से  तुम जब बरसाते हो बादल अपने मेरे घर आँगन चमक से  जाते  है  तुम मुझे देख  कर  मुस्कुराते  हो मैं तुम्हे देख कर खुश हो जाती हूँ  नहीं जानती क्या है नाता तुम से  बंधू  ,सखा, सहोद...

निपट लूँगी।

  सुबह होने से  पहले  ही  मैं अंधेरो से निपट लूँगी। मेरे दर के तूफानों सुनो  मैं तुम से भी निपट लूँगी।  ना करा  अहसास   मुझे  तू अपने खुदा  होने  का।  ये  अलग  बात  है  मेरी  कल  तुझसे निपट लूँगी।  आराधना                                

पीली पत्तियाँ

आते जाते सौरभ ,सुगंध से मन के कुछ वातायन खुले हरी भरी इस फुलवारी में नित नए पल्लव हार खिले सरल नहीं यू फुलवारी में रोज ही मुक्ता हार मिले कंटकों को ही अपना कर  पुष्पों का ये वरदान मिले झरझर गिरते अश्रु से ही सींची थी ये मैंने फुलवारी अपनी -अपनी कह कर ही प्रेम -सुधा  सब बरसा डाला इतने पर भी संतुष्ट नहीं मैं अन्तस से पुछू ये ही हर बार इतना सब होने पर अबतक  क्यू प्रेम का काव्य रचा नहीं झड़ते पत्ते हंस कर यू बोले क्यों स्नेह मृत्यु से  करा नहीं मिटना ,बनना विधि तलक था पर उसने जब हार ना थी मानी फिर क्यू  इतना तू  इतराती है तू  है इतनी  क्यों री  अभिमानी मैंने केवल सुख का, व्यापार किया दुःख ,दुविधा से दूर रही जब में किसका ,कब कैसे उद्धार किया चली सदा ही  निज  की चाहत में औरो का कब मैंने सम्मान किया देखा है रवि को क्या यू  बस रोते फूलों ने फिर से नव झंकार किया नव किसलय को सहला कर बस पत्तों ने  सह...

नज़्म बेवज़ह नहीं

कोई वादा नहीं फिर भी क्यू  तेरा इंतज़ार करती हूँ अपनी तन्हाइयों में अक्सर दिल कि बात करती  हूँ। बेवज़ह तो नहीं ये सब बातें,या  यू ही बेक़रार रहती हूँ जाते हुये से इस पल में ,नींद से ख़्वाब क्यू मैं  चुनती हूँ। कोई सुन ले ना ज़बां से बस उफ ,होठो को सिये रहती हूँ चुप हूँ ख़ामोश हूँ मैं ,अपनी आँखों से ही मैं बात करती हूँ। आराधना

इकरार

वो बच गया सौ-सौ ख़ून कर के भी हम ही  तड़पे   इकरार कर के भी। न कोई  शिकवा ना कोई  गिला था  जो मिला  था नसीब से ही मिला था तुम्हारी पेशानियों  पर, जो सलवटे हैं मेरी ही सोच के ये सब  सिल-सिले  है तुम्हारी बातें मेरी ज़हन को लुभाती है मेरी हर सोच में  कहीं बस से गये  हो गज़ब सी दांस्ता मेरी अजब आरजू है न बन सकी कभी , न बिगाड़ी गई  है। हर एक बात उसकी कुछ लाज़मी सी  थी अंदाज़ भी बड़ा हीं उसका आशिक़ाना था यही हर बार हंस कर सोचते क्यों "अना" जो कल तलक अपना था आज बेगाना  है     आराधना ''अना''संक्षिप्त नाम का  उर्दू में अना का मतलब है    self-respect 

हाल -ए दिल

हाल -ए दिल --------------------- तुझ से रूठी हुई हूँ आओ माना लो मुझको दूर से ही सही आवाज़, लगा लो मुझको हाल -ए दिल पूछते हो गैर से क्या दिल धड़कने का सबब तेरे कोई और है क्या दो घड़ी का है सफ़र मुझको बताता है कोई साथ फिर कैसे रहेगा ,मुझको बताता है कोई खुद से ग़मगीन नहीं ,तुझ से मुतमईन नहीं मै ज़फा ना कर सकी तेरी वफाओं से कभी आराधना

नहीं जानती हूँ।

अभी मैं लिखना नहीं जानती हूँ , ख़्वाब बुनती हूँ मन के धागों से जिसे सिलना भी नहीं जानती हूँ , कोई ओस की बूंद  हाथ में आई, मानो शबनमी  धूप में फिर  हो नहाई। क्या कहू  ज़ज़्बात कि ही मानती हूँ, अभी तो मैं लिखना भी नहीं जानती  हूँ। कोई मीठी सी बात होठो पे आकर मुस्कुराई, उसे तो मैं अभी  जीना भी नहीं जानती हूँ। आराधना

कारोबार किया।

सुख -सपनों कि राह ही  छोड़ कर बस दुःख  का ही कारोबार किया। मूक हो चूके जिनके सब  स्वर ही बस उनका ही गुणगान किया। भला -बुरा सोचा ही कब किसने सत्य समर्पण बारम्बार किया। लेना -देना ही  जिनकी थी  नियत रीते हाथ  से  प्रेम व्यवहार किया। सुख -सपनों कि  राह ही   छोड़ कर बस दुःख का ही कारोबार  किया। आराधना   

मान रख जाऊँ

सैकड़ो बार क्यों ठुकराई जाऊँ कभी निष्कासित करी जाऊँ  वन-वन   में भटकाई  जाऊँ किसी राम कि सीता थी क्या जो  अग्नि परीक्षा भी  दे जाऊँ नहीं द्रौपदी मैं किसी की भी जो पांडव मे भी बाँटी जाऊँ है ये कौन सा साम्राज्य यहाँ जहाँ रोज़ मैं निगली जाऊँ कौरवों के साये में रह कर रोज़ ही दाँव पर खेली जाऊँ रोज़ अख़बार कि सुर्खियों में इधर -उधर ही बांची जाऊँ रद्दी की ढेरों में फेंकी जाऊँ  चाय कि प्यालियो कि तरह मेज़ पर बस परस भर दी जाऊँ भूमि के टुकड़े कि तरह यू ही भागों में बटती ही चली जाऊँ श्याम  नहीं तुम   राधा बन जाऊँ राम नहीं तुम  मैं सीता  बन जाऊँ नारी हुँ नारी का मान रख जाऊँ आराधना

गीत हूँ।

न मैं मनमीत न जग की रीत ना तेरी प्रीत बता फिर कौन हूँ घटा घनघोर मचाये शोर  मन का मोर नाचे सब ओर बता फिर कौन हूँ मैं धरणी धीर भूमि का गीत अम्बर की मीत अदिति का मान  हूँ आराधना 

रास्ते दुनियाँ के

छिपाना भी ज़रूरी था बताना भी ज़रूरी था ये  दस्तूर दुनियाँ का निभाना भी ज़रूरी था। वही मंज़र पुराने से वही वो वदिया होंगी नई बस्ती बसाने में समय का दायरा होगा। गए जो रास्ते मुड़के न उनका पता होगा निगाहों से ज़रा पूछो नया क्या मरहला होगा। आराधना

मेरी दुनियाँ का नाता,

मेरी दुनियाँ का ये नाता, हर रोज़ निभाया जाता है रोज़ मिटा के ये तकदीरे  , रोज़ बना  दी जाती है।     हर रोज़ सुबह लगते मेले हर शाम तमाशे बंद हुये   हर बार ही परिभाषा  बदली  हर रिश्ते की ,हर नाते की।  हर रोज़ यहाँ बाजार सजे  हर रोज़ ही आई दिवाली  ये जिस्म ढले ,ये रूह बनी।  ये सॉस रही ,चलती रूकती। रुका न  कोई कार्ये व्यापार यहॉ  मेरे नातो का,मेरे इन रिश्तो का कोई मोल यहॉ फिर कब  रहता है  यहाँ रोज़ ही बनते है ये जब  रिश्ते।   तेरी दुनियाँ में जब हम  आये है  देखे तेरा अब तेरा भी ईमान यहाँ   जो गए मुसाफिर  इस जग से  ही  अब उनका फिर शेष निशान  कहाँ।  आराधना  प्रेरणात्मक आभार  स्वर्गीय पंडित त्रिवेणी राय।  

शम्मा-ए -रौशन जलाये रखना ।

तुम पे  इल्ज़ाम लगायेगी दुनियाँ लेकिन दिल में शम्मा -ए -रौशन  जलाये रखना । वो जो नश्तर भी चुभोयेंगे दिल में गर  तेरे अपने ज़ख्मों को खुद से ही  छिपाए रखना। कुछ भी सवाल करें दुश्वार हो ज़ीना  लेकिन दिल के आईने को तू ना कभी  दरकने देना। बहूत पैनी हैं ये दुनियाँ कि निग़ाहें ये  ''अरू '' अपनी आँखों को तू नहीं कभी  झुकने  देना। copyright : Rai Aradhana ©

फिर आऊँगी پھر اوگي

तुझसे बिछड़ी तो मैं  फिर  बिखर जाऊँगी। फिज़ाओ में मैं  तुझे रंग बन के पाऊँगी। भीगते सावन में मै बारिश  बनके आऊँगी।                               बूंद -बूंद बरसूँगी मैं आँखो से भीगा जाऊँगी। बेक़रार तमन्ना लिए सहर बन के आऊँगी।       copyright : Rai Aradhana © आराधना               تجھسے بچھڑی تو میں  پھر بکھر جاؤں گی. پھذاو میں میں تجھے رنگ بن کے پاوںگی . بھيگتے ساون میں مے بارش بن کے اوگي . بوند -بود برسوگي میں آںکھو سے بھیگا جاؤں گی. بےقرار تمنا لئے سحر بن کے اوگي . ارادھنا

मन का पंछी

तुम बोलते नहीं कुछ कभी पर कुछ है जो कह जाते हो। कठोर से कठोर बात भी कहि     मौन हो सबकुछ  सह जाते हो। किस देश के पंछी हो सुनो तुम  बात जो अनकही कह जाते हो। सुगंध व्यार से बस बह जाते हो मेरे  ही आस -पास रह जाते हो । copyright : Rai Aradhana ©

लेके चले

                 बहुत दूर ठिकाना था उसका लेकिन संग  कौन सा ज़हान हम ले के चले  बदस्तूर ही जारी है ये  रवायत  उसकी  पहुँच कर ही जानेंगे शिकायत उसकी   करेंगे तेरा ये क्या जो बहे अश्क ''अरू ''   चुभन रह जाएगी बाकी एक बन के सदा आराधना                                                                     copyright : Rai Aradhana ©

क्या बात हुई

गम  की बरसात हर शब -ए  रात हुई , तेरे जाने के बाद  बस यही ये बात हुई. ये आज़माइश थी जो मेरे ही साथ रही मुद्दतों तक चाँद तारो तुमसे ही बात हुई कहने से अगर होता तो हम भी कह देते तेरी आहटों से दिल की ज़मीं आबाद हुई  वही दुनियाँ वही है हम वही यादे चमन है दीवारें पूछती है सरे शाम से क्या बात हुई copyright : Rai Aradhana © आराधना

निज का मान कर

निज पर तू ही मान कर औरस का सम्मान कर। ना स्वयं पर अभिमान कर  ना स्वयं का  अपमान  कर। वीरता से  धीरता का शौर्य का  एक नया तू भी इतिहास रच। तुझ में बल है सबल हो तुम प्रबलता का तू ये दान  कर। कोई बुझा दीपक जला कर तू किसी तम से फिर लड़। उद्धार कर, अपना तू नारी स्वयम को साकार तू  कर   copyright : Rai Aradhana ©

स्त्री ही स्त्री को नहीं जानती

अपने आप को क्यू नहीं जानती जंग किससे लड़े क्यू नहीं जानती दुःख भंजनी ,क्यों  दुःख को  ना हरे अपने दुखों को ही नहीं क्या जानती विवाह वेदी अंतिम चिता नहीं बनती गर हर सास माँ भी बनना जानती कोई बुढ़ापा गलियों नहीं सिसकता गर बहु भी कुछ बेटी बनना  जानती दुहाई  कानूनों को सिर्फ क्यू देती हो स्वयं को जागृत करना नहीं जानती लज़्ज़ा से सिर झुकायें स्त्री खड़ी हो  लाज किसी की ढकना नहीं  जानती पत्थर जब मारता ये  पुरुष समाज है साथ मिल कर तुम ताने नहीं मारती स्त्री ही स्त्री को क्यों फिर नहीं जानती अपनी श्रेष्ठता स्वयम नहीं पहचानती आराधना copyright : Rai Aradhana ©

ज़िंदगी

ज़िंदगी गर सवाल है जबाब तो ढूंढ दीजिए। आईना बन के खड़ी है निहार तो इसे लीजिये। जब ये मन खो रहा हो नई बात कोई भी ढूँढिये। प्रश्न ना बने ये जीवन उत्तर तो कोई दीजिये। आराधना copyright : Rai Aradhana ©