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लेके चले

                 बहुत दूर ठिकाना था उसका लेकिन संग  कौन सा ज़हान हम ले के चले  बदस्तूर ही जारी है ये  रवायत  उसकी  पहुँच कर ही जानेंगे शिकायत उसकी   करेंगे तेरा ये क्या जो बहे अश्क ''अरू ''   चुभन रह जाएगी बाकी एक बन के सदा आराधना                                                                     copyright : Rai Aradhana ©

क्या बात हुई

गम  की बरसात हर शब -ए  रात हुई , तेरे जाने के बाद  बस यही ये बात हुई. ये आज़माइश थी जो मेरे ही साथ रही मुद्दतों तक चाँद तारो तुमसे ही बात हुई कहने से अगर होता तो हम भी कह देते तेरी आहटों से दिल की ज़मीं आबाद हुई  वही दुनियाँ वही है हम वही यादे चमन है दीवारें पूछती है सरे शाम से क्या बात हुई copyright : Rai Aradhana © आराधना

निज का मान कर

निज पर तू ही मान कर औरस का सम्मान कर। ना स्वयं पर अभिमान कर  ना स्वयं का  अपमान  कर। वीरता से  धीरता का शौर्य का  एक नया तू भी इतिहास रच। तुझ में बल है सबल हो तुम प्रबलता का तू ये दान  कर। कोई बुझा दीपक जला कर तू किसी तम से फिर लड़। उद्धार कर, अपना तू नारी स्वयम को साकार तू  कर   copyright : Rai Aradhana ©

स्त्री ही स्त्री को नहीं जानती

अपने आप को क्यू नहीं जानती जंग किससे लड़े क्यू नहीं जानती दुःख भंजनी ,क्यों  दुःख को  ना हरे अपने दुखों को ही नहीं क्या जानती विवाह वेदी अंतिम चिता नहीं बनती गर हर सास माँ भी बनना जानती कोई बुढ़ापा गलियों नहीं सिसकता गर बहु भी कुछ बेटी बनना  जानती दुहाई  कानूनों को सिर्फ क्यू देती हो स्वयं को जागृत करना नहीं जानती लज़्ज़ा से सिर झुकायें स्त्री खड़ी हो  लाज किसी की ढकना नहीं  जानती पत्थर जब मारता ये  पुरुष समाज है साथ मिल कर तुम ताने नहीं मारती स्त्री ही स्त्री को क्यों फिर नहीं जानती अपनी श्रेष्ठता स्वयम नहीं पहचानती आराधना copyright : Rai Aradhana ©

ज़िंदगी

ज़िंदगी गर सवाल है जबाब तो ढूंढ दीजिए। आईना बन के खड़ी है निहार तो इसे लीजिये। जब ये मन खो रहा हो नई बात कोई भी ढूँढिये। प्रश्न ना बने ये जीवन उत्तर तो कोई दीजिये। आराधना copyright : Rai Aradhana ©

चोट का दर्द

अब के गया तो फिर नहींआएगा वो। डूबते सूरज सा पिघल जायेगा। चोट जब लगती है दिलों -ईमान पर आदमी क्या लोहा भी पिघल जाता है किसी दूकान पर। एक साया रह जाता है सुहानी याद का।          

याद आई

बहुत याद आई फिर बचपन की अपने, दूर बहुत दूर जब सपने सजा करते  थे । पास आ जाता था मन का आकाश भी, सीमा से परे जाती मन की कल्पना थी। मुट्ठियों में जब बांध जाता  आकाश  था हिरन की कुलाचे भरते भागते  मन  थे। फिर याद आया वो बीता जमाना मुझे बड़ा  दीवाना ज़माना ये  लगा था मुझे। आराधना copyright : Rai Aradhana ©

क्या चाहती हूँ

गीत हुँ मै, गुनगुनाना चाहती हूँ। धूल हुँ मैं , पलकों उठना चाहती हूँ।  पूर्णता -अपूर्णता नहीं जानती हूँ।  क्षुब्ध हुँ पर मैं जीवन चाहती हूँ।  टूटे पत्थरों को दिन-रात जोड़ती हूँ ।  कौन सी ज़िद्द है नहीं ये जानती हूँ ।  एक मैं देवालय बनाना चाहती  हूँ।  देव उसमें खंडित बसाना चाहती हूँ। copyright : Rai Aradhana © बहुत याद आई फिर बचपन की अपने, दूर बहुत दूर जब सपने सजा करते  थे । पास आ जाता था मन का आकाश भी, सीमा से परे जाती मन की कल्पना थी। मुट्ठियों में जब बांध जाता  आकाश  था हिरन की कुलाचे भरते भागते  मन  थे। फिर याद आया वो बीता जमाना मुझे बड़ा  दीवाना ज़माना ये  लगा था मुझे। आराधना copyright : Rai Aradhana ©

फागुन तेरे जाने के बाद

चैत की चितवन निराली भोर की लालिमा न्यारी प्रीत की नई रीत लेकर होली आई , होली आई फुहार छोड़ेगी पिचारियाँ रंगो की भरमार यू छाई चैत का चेता  छिड़ा है फागुन तेरे जाने के बाद होली आई ,रे  होली आई  सहर्ष  मन को भरमाई रे copyright : Rai Aradhana ©  

ख्वाब आवाज़ देगाخواب آواز دے گانظم

नज़्म कोई ख्वाब आवाज़ देगा बुलालेगा ,बैठा लेगा हमे आहटें ,खोलेगी दरवाज़ा खामोशियाँ  फिर बातें करे  गुफ़्तगू यूही चलती रहेगी बादलों, हवा ,रुखसार की ज़िन्दगानी बहती रहेगी बात -बेबात   ,बेबाक़ सी महफिले ये सजती रहेंगी साज भी ये  बजते रहेगें ख्वाब ये   फिर से  सजेंगे चूड़ियों कि खनहनाहट से आहटे खोलेंगी ये दरवाज़ा ख्वाब जब ले आएगा  कोई copyright : Rai Aradhana © आराधना                                                                                                   کوئی خواب آواز دے گا بلالےگا، بیٹھا لے گا ہمیں اهٹے، كھولےگي دروازہ كھاموشيا پھر باتیں کرے   گفتگو يوهي چلتی رہے گی بادلوں، ہوا، ركھسار کی ذندگاني...

मन

 बीती बाते मन ही मन शोर मचाएगी साँझ  बिरहन जब गुमसुम आ जाएगी मन का खाली  कोना खाली न रह पायेगा नयनों के कोरो से छ्लक- छ्लक आ  जाएगा। होली के रंग भी मन को ना रंग ये जब पायेगे लाल ,गुलाबी, नीले,पीले,बादल बहुत रुलायेंगे दोनों बाहें ,फैला कर ,घर आँगन तुझे बुलायेंगे दूर देश में रहने वाले ,लौट के घर जब ना जायेगे। सतरंगे सपनों कि माला हरपल तुझे  लुभायगी हरी चूड़ियों के हिलने पर याद तुम्हारी आएगी कोई घर में नीर बहा कर रात को ना  सो पायेगा सन्नाटे ही सन्नाटे में मन कुछ भूल ना पायेगा मन की बातें मन ही जाने ,कोई भी समझ न पायेगा गया समय जब हाथ दिखा कर दूर कहीं छुप जायेगा। copyright : Rai Aradhana © आराधना -----------------------------------------------------------------------------------------------------------

होली

आज होली ना खेलेंगे तुम संग गुलाल अबीर सोहे ना अब  रंग आज मारो ना मोहे यू  पिचकारी नैनों से भीगी है मोरी पूरी साडी कोई भाए ना मोहे अब  बृज में रंग फीके सभी , इन के संग में कहा श्याम छिपे , हो  कुंज में मैं ढुढ़ू तुम्हें , सब गलियन में मैंने प्रीत की रीत जो निभाई अंसुअन की माला भी पहनाई अब श्यामा ही डालेंगे रंग ये जो ना छूटे कभी ऐसा संग ये  होली की शुभ कामनाओं के साथ आराधना copyright : Rai Aradhana ©

कैसे कहे

रक़्स  और रक्त के खेल जारी है जब कैसे गाए ये मन  कैसे आये  वसंत। सूनी - सुनी पड़ी ,गावों की गलिया शहर भी दर्द से चीखता ही रह गया। कैसी अर्थी उठी किसी दुल्हन की फिर कैसी थी कामना चिर सुहागिन  गई। कैसे है लोग दर्द जिनको होता नहीं कैसी बेचारगी जो बोल सकते नहीं। लोभ -लाभ की बात  मुखरित रही प्रेम और प्रीत की भाषा खंडित हुई। कल जो मिट गए ,सड़क के मोड पर थे वो भी किसी के बेटे और बेटियाँ। चुपी साधे रहे,शहर के बेशर्म रास्ते गाँव की गली भी सर झुकाए खड़ी। तू है राहगीर ,तो चोर समझेगे सब तू मुसीबत ज़दा कब ये  मानेंगे अब। रात में मौत सड़कों पर चलती है अब रक्त से रजित पड़े थे किसी के लाडले। स्वयं विधता भी देखकर दुखी हो गया होड़ कैसी लगी ,नर और नारी में अब।  प्रश्न है काल का जश्न क्या मान का माँ की लोरी कोई भेद समझी है कब। गौर से एक दिन हम भी सोचें बस ज़रा  रक्त और रक्स हम पे क्यू हावी हुआ। जब ये जीवन  मिला था ज़ीने के लिए खेल ही खेल में दावानल सा बन गया । प्रश्न है अनुत्तरि...

फ़लसफ़ाفلسفہ

बहुत हुआ अब तो ये खेल बंद करो पास बैठो मुस्कुराओ बातें चंद करो तमाम उम्र  गुज़रीं रुठने मनाने में कोई नई बात जोड़ों इस फ़साने में एक मुस्कुराहट मांगते ही हम थके  ज़माना लगेगा बीती बातें भुलाने में तुझको मालूम है 'अरू ' उदासी का सबब मुझपे इलज़ाम तो लगा मेरी जानिब से आराधना copyright : Rai Aradhana © فلسفہ   بہت ہوا اب تو یہ کھیل بند کرو پاس بیٹھو مسکراہٹ باتیں چند کرو تمام عمر گذري رٹھنے منانے میں کوئی نئی بات جوڑوں اس فسانے میں ایک مسکراہٹ مانگتے ہی ہم تھکے   زمانہ لگے گا بیتی باتیں بھلانے میں تجھکو معلوم ہے 'انا' اداسی کا سبب مجھپے الزام تو لگا میری جانب سے ارادھنا

ना कुछ सत्य है ,ना शिव और ना कुछ सुन्दर है

ना कुछ सत्य है ,ना शिव और ना कुछ सुन्दर है जीवन-तू क्या है बस दुःख का अथाह समुन्दर है आती-जाती श्वासों की इन लहरों में कोलाहल सा बसा हुआ निश्वासों का उत्ताप मचाता जीवन सा अधरों पर बन कर एक पहचान अमित चिन्ह   सा या अंत समय आये कोई अनचीन्हे एक अतिथि सा गरिमा सुख की कब कहो सलिल सरित सा बहती थी विश्वास के चन्द्र जब  लहरों में ज़्वार -भाटा  लाते थे    हर पल तेरे इन नयनो ने तूफान छिपा सा रहता है हर पल मेरी ही बातें वेग कुछ   समय का छलती है जीवन तू छीन-भिन  है उच्छल सा मेरे  सपनों सा तू  जीवन क्षुधा -तृषित मरीचिका मृग तृष्णा सा आराधना   copyright : Rai Aradhana © एक शब्द आपने दिया था पापा एक शंब्द मैंने लगा कर आपकी कविता पूरी की पर आप के जाने के बाद 

जगाए खण्डहर सोता है

                                              सदियों सदियों जागा है वो ,बिसरी बात सुनाने को  नव प्राचिरो से भी झाँका ,खोई बात बताने  को                                             सुनो यहाँ फिर सब अपना खोता है ,जगाये खंडहर सोता है                                वरद स्वयम अपना खोता है ,पल पल खड़ा मौन बस रोता है।                                                       जगाये खण्डहर सोता है                              ...