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मन




 बीती बाते मन ही मन शोर मचाएगी
साँझ  बिरहन जब गुमसुम आ जाएगी
मन का खाली  कोना खाली न रह पायेगा
नयनों के कोरो से छ्लक- छ्लक आ  जाएगा।

होली के रंग भी मन को ना रंग ये जब पायेगे
लाल ,गुलाबी, नीले,पीले,बादल बहुत रुलायेंगे
दोनों बाहें ,फैला कर ,घर आँगन तुझे बुलायेंगे
दूर देश में रहने वाले ,लौट के घर जब ना जायेगे।

सतरंगे सपनों कि माला हरपल तुझे  लुभायगी
हरी चूड़ियों के हिलने पर याद तुम्हारी आएगी
कोई घर में नीर बहा कर रात को ना  सो पायेगा
सन्नाटे ही सन्नाटे में मन कुछ भूल ना पायेगा


मन की बातें मन ही जाने ,कोई भी समझ न पायेगा
गया समय जब हाथ दिखा कर दूर कहीं छुप जायेगा।
copyright : Rai Aradhana ©
आराधना
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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

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