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एहसास


दिल के एहसास को ज़िया जाता है
मुस्कुरा के हर दर्द पिया जाता है
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 इश्क़ में बदनाम हुआ जाता है
 रिश्ता  दिल से निभाया जाता है
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चोट लगने पे रोकर सो जाता है
मासूम दिल जब सताया जाता है
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 दामन में सिमट कर  बता जाता है
मेरा अक्स मुझ से  छिपाया जाता है
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दिल के दर्द का पता बता  जाता है
चाँद कि चाँदनी में समाया जाता है
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 कान्धों पे सर रख अश्क बहा जाता है
 ज़िन्दगी तुझ से क्या बताया जाता है
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 बात कर ख़ुद हालात पर रो जाता है
  इल्ज़ाम  "अरु " पर लगाया जाता है
आराधना राय "अरु"














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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))