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मन की भूमि

मन की भूमि
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उपज रहा मन की भूमि पे
विप्लव अंकुर का ही धान
किस पे बाड़ लगा रोकोगे
कैसे बचा पाओगे सम्मान
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भूखा पेट राम ना क्या जाने
रवि और रंजन की बात यहाँ
कोडी और छदाम क्या जाने
अश्रू बहे, तन का लहू बहे यहाँ
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नारी की लज़्ज़ा की बात कहूँ
माँ के उधड़े तन को देख कर
कौन सा मनुज है जो ये कहे
तेरा मुझसे क्या नाता है कहूँ
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बाँझ रहे मन क्या किस से कहे
बोझ बेमानी क्यों स्वयं पे धरे
तरु उखड़ते भू पर क्या गिरे
झंझावातों से जो प्रतिदिन लड़े
आराधना राय "अरु" 

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))