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सवालात

 एहतमाद के काबिल ना थे उनका ख्याल किए
 दिलों में नश्तर चुभा के सौ  सवालात किए

तेरी पनाह में झुक कर सज़दे  हज़ार किए
उससे जीने के वादे  हमने हज़ार किए

वफ़ा कि बातें  हमारी ज़ानिब से  बार-बार किए
क़त्ल कि रात हर लम्हा हमारा इंतज़ार किए

उसी के नाम का सदका हज़ार बार किए
उसी को खुदा मान कर सौ- सौ काम किए

अज़ीम ग़ैरत  रही  जिन्होंने  सवालात किए
अज़ीब बात है "अरु " तुझसे हर सवाल किए  
आराधना राय


copyright : Rai Aradhana ©

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))