Skip to main content

कहाँ



                                कहाँ  
---------------------------------------------------------------------
मेरे  चेहरे कि गढ़न भी याद होगी अब उसे कहाँ  
उस का वास्ता मुझ से यू भी ऐसा भी रहा ही कहाँ

वक़्त जब  चला  जाता है कोई रोक पाता है कहाँ
बीतते लम्हों में कैद ये  जिस्म यू रह पाता  कहाँ

ढूँढते फिरे जिसे जीने के लिए वो मिला ही कहाँ
अनजान सी यादें थी "अरु " कोई जीया ही कहाँ

आराधना राय 

Comments

Popular posts from this blog

कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))