Skip to main content

Posts

पैगाम

पैगाम आई बहार , और ले गई दिल  के करार  को चन्द हादिसे नज़र रहे इस   बू-  ऐ- यार को कुछ चाहते बची रही वो भी  ख़ार हो चली क्या रह गया ना पूछिये दिल -ए -दागदार क़ो बीती हुई एक बात कही दिले  नागवार को कुछ तो गिला रहे   कही 'अरू  ' अबकी बार तो copyright : Rai Aradhana © Paigāma  ā'ī bahāra, aura lē ga'ī dila kē karāra kō canda hādisē nazara rahē isa bū- ai- yāra kō kucha cāhatē bacī rahī vō bhī ḵẖāra hō calī kyā raha gayā nā pūchiyē dila -ē -dāgadāra qō bītī hu'ī ēka bāta kahī dilē nāgavāra kō kucha tō gilā rahē kahī 'anā' abakī bāra tō پیغام آئی بہار، اور لے گئی دل کے معاہدہ کو چند حادثے نظر رہے اس بو- ے- یار کو کچھ چاہتے بچی رہی وہ بھی خار ہو چلی کیا رہ گیا نا پوچھيے دل محمد -داگدار قو بیتی ہوئی ایک بات کہی دل ناگوار کو کچھ تو گلہ رہے کہی 'انا' اب کی بار تو

اتها इंतहा

                              इंतहा  कागज़  की कश्ती  से  ये  दुनिया पार  लगाते  है  बेहोश  सही ,लेकिन  कब  हम इल्ज़ाम  लगाते  है  हम  हो  कर  ख़ाक नशी  कुछ  यू  ही फ़रमाते  है  मंज़िल ना सही ,ना  सही  एक सफर को जाते  है  मिट कर जो  रहे  ज़िंदा  एक ख्वाबे  सहर  सा  है    अहले  गम  को  निभाना   क़्या  दस्तूर पुराने  है      दरियाफ़्त   करे किससे , किस दशत ने जाना है  उलझन  ये अजब समझो , दरिया  यही प्यासा  है  जो जल न सके  बुझ  कर वो आग नहीं  हूँ "अरू " कुछ  दहके  हुए  शोले ,दामन में   मेरे बाकी  है  ...

मौन

      गीतों  के  बोलो  से , निकली  हो जैसे वीणा  की झंकार , अश्रु  की धारा से   व्यथित ह्रदय से निकली हो  कोई बात दुःख ने पहचानी ,  दुःख के  मौन क्रंदन की भी आवाज़ ठहर गया समय , या बीतते पलो ने कह दी अपनी बात कहानी सी , ढली अश्रुओं से  भीगा ,निकला एक काव्य स्पंदन रहित  हो हृदय ,करता रहा पुकार बस  बारम्बार पाती थी दुःख की या छिड़ा था जैसे कोई विहंगम राग शेष , रह गया ,लालिमा से उष्मित , रंजित आकाश , तूलिका उर्फ़ आराधना copyright rai aradhana rai  © ,    

आहुति

                                                                                   आहुति                            उठ रही है ,मन में क्यू चिताएं ।                           अतिथि बन घर आ गई क्यों आपदाए।                           प्रश्न है ,सब से कोई उत्तर  सुझाए।                          किस जगह जा कर बसे , मृदु भावनाए।                                                     ...

ग़ज़ल ज़र्रो की

              बना के आशियाँ मेरा , वो छुप गया  कहीं               दरों ,दीवार क़ो बस देखते फिरे  हम यू ही                ना  दोस्ती की कभी जोरे ज़ब्र से हमने यू ही                             कहीं हर एक बात तन्हां खामोशियों से यू ही                  बदगुमानी ही सही, होती रही मुझको कहीं                  तेरा साया था जहां रोती रही रात भर यू ही                                ये कहना जुर्म था  'अरू  ' कौन बदहवास कही               खून बन के दौड़ता ही फिरा,बरसों रनाइयो में यू ही          ...

दिल

दर्द जब ज़ुबां देता है , खूबसूरत अहसास को जन्म देता है पानी में उठते बुलबुलों कि तरह रोज़ मरते है रोज़ जीते है क्यू फ़से है इस कफ़स में यहाँ ऐसी उलझन में यू रहते है शिकवा हम यहाँ किस से करे मेरी दुनियाँ ही रूठ के बैठी है एक तेरे नाम पे जीते है ,हॅंस के दुख भी अब झेल ही लेते है इश्क है तुम से खुद को बहला कर हम भी तो जीते ही रहते है आराधना राय copyright :  Rai Aradhana   © मेरे नाम दिन के उजाले हुए है अंधेरों को हम क्यों पाले हुए है किन मज़बूरियों में ढाले हुए है हालत तंग दिल में छाले हुए है ख्वाब क्यों हमने फिर पाले हुए है हसरतों कि ख्वाहिशें जाने हुए है Tulika ग़ज़ल ,गीत ,नग्मे ,किस्से कहानियों का संसार copyright :  Rai Aradhana   ©

अपराध-बोध

                                          अपराध- बोध     "माँ ,आज़ स्कूल जाने में फिर देर हो गई , छुट्टी ले लू क्या !  मुँह बनाते हुए चिकी  ने पूछा, पर  माँ  ने ध्यान नहीं दिया , स्कूल बैग पीठ पर लटकाए , पैर घसीटती हुई वो घर से निकल गई। स्कूल जाने की उसकी ज़रा भी इच्छा नहीं हो रही थी । मैथ्स  के चार पीरियड थे , फिर क्लास टेस्ट भी था, नम्बर कम आते  ही गीता मैडम , उसे ही देख - देख कर फिर बोलेगी , कॉपी तो इतनी स्मार्टली बनाई है , नंबर भी ऐसे आते तो क्या बात थी ?             अपने ख्यालो  मे गुम चिकी ,स्कूल के सामने खड़ी थी ,उस का ध्यान हाथ की कलाई पर चला गया ,            स्कूल पहुँचने में उसे 15 मिनट की देर हो गई थी ।              " अब क्या करू ? चिकी धीरे से फुसफुसाई स्कूल गई तो बिना बात के ही फिर टीचर की डाँट   ...

विश्वास

                                                              साभार गूगल इमेज़                                    (कहानी)            विश्वास              उसके पैर मानो जम से गए थे ,शरीर में ताकत न होने पर भी ,वो हॉस्पिटल के कमरे से निकल कॉरिडोर में निकल आई ,उसने सोचा भी  ना था की जिस रिश्ते से जीवन भर की डोर बंधी है वो इस तरह बेमानी हो जायेगे ,अपने आँसूओ को थाम कर शैलजा ने आस पास नज़र दौड़ाई  ,उसके पति  सास , ससुर  डॉ कमरे  मैं बैठे थे , उसकी तरफ उसकी निगाह नहीं थी ,अच्छा मौका देख कर  शैलजा , वहाँ से भाग निकली , हालत के मारो का ठिकाना ,केवल मौत है ,अब तक वो यही जानती थी ,ना चाहते हुए भी उसके कदम अनजान रास्तो पर चल पड़े ।  बिना पति...

ज़द्दोज़हद

                                                                                                                                                                                                                                         पैमाने और  पैमानों  के  ऊपर कसी गई                                    जं...

اعتراف - Itiraf एतरफ (Confession )

               साभार    गूगल   इमेज                                            नज़्म   एतरफ  اعتراف  Confession   दिली एहतमाद है मुझे तुझसे जो है  एक दूसरे का बस  एहतराम ,नहीं है दिल ने दिल से कहीं, वो बात नहीं है  तन्हाइयों के नाम मेरा पैगाम यही है रुसवाईयाँ,शिक़वे गिले सब नज़र में है  पर तुझ को छोड़ कर मंज़िल ही नहीं है  मेरी दुनिया तेरी उम्मीदों से यूँ परे ही है   वादे है ,हसींन मगर फ़रेब की तरह ही है   ये दुनियाँ सरकश सी सराब की तरह यूँ है   दिखता है क्या न पूछिये  बाजार ही तो है  मायूस हूँ ,खुद से मगर ना उम्मीद नहीं हुँ  ये हौसला इस जद्दोजहद में बाकी है दोस्त   , टूटेगा तेरा , इस्रार इक रोज़ तो मेरे ही आगे, झुकता है कभी आसमां ज़मी के  कही आगे   इस , ताबो , तपिश की भी ना  तासीर रहेगी , ...

जन्म अन्तिम भाग

 जन्म  शालिनी नाम का डर , उस की ज़िन्दगी से निकल चूका था वो अपने आप को ये कब का समझा चूका था ,बस एक चुभन थी , जो किसी चीज़ को न पा कर होती है। दूर से बैसे भी हर लड़की शालिनी जैसी ही लगती ,पर उस हादसे में वो बची भी होगी तो कैसी ? गगन की हंसी उसे अब भी सुनाई पड़ रही थी ,.   अगले दिन शिशिर छुट्टी के मूड़  में उठा , रात  की बात  और अपनी सोच पर उसे हँसी  आ  रही थी । रोज़ी , लता ,चारु ,कविता औरो के तो नाम भी याद नहीं  कितनी आई और जाएगी , आज नलिनी  से मिलने  का टाइम फिक्स है फिर और बातो के लिए उस के पास टाईम  नहीं, 35 कोई उम है शादी कर ने की ।  अभी भी उसे लोग 25 का समझते है , फिर शादी करके एक के साथ बंधे रहो , अनिरुद्ध नहीं हुँ भाईसाब जैसा , ऑफिस में  लड़किया खुसपुसती है सर की शादी हो गई ..  अपनी एक कलम के वार से किसी की भी  रिपोर्ट  अच्छी.....................  या  ख़राब   कर सकता था। अनिरुद्ध ने एक  दिन कहा था। ..   'तेरी भी शादी हो गई होती तो , ...