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मौन


     
गीतों  के  बोलो  से , निकली  हो जैसे वीणा  की झंकार ,
अश्रु  की धारा से   व्यथित ह्रदय से निकली हो  कोई बात
दुःख ने पहचानी ,  दुःख के  मौन क्रंदन की भी आवाज़
ठहर गया समय , या बीतते पलो ने कह दी अपनी बात
कहानी सी , ढली अश्रुओं से  भीगा ,निकला एक काव्य
स्पंदन रहित  हो हृदय ,करता रहा पुकार बस  बारम्बार
पाती थी दुःख की या छिड़ा था जैसे कोई विहंगम राग
शेष , रह गया ,लालिमा से उष्मित , रंजित आकाश ,
तूलिका उर्फ़ आराधना
copyright rai aradhana rai ©




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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))