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नज्म चाँद रात

हाथो पे लिखी हर
तहरीर को मिटा रही हूँ
अपने हाथों  से तेरी
तस्वीर मिटा रही हूँ

खुशबु ए हिना से
ख़ुद को बहला रही हूँ
हिना ए रंग मेरा
लहू है ये कहला रही हूँ

दहेज़ क्या दूँ उन्हें मैं
खुद सुर्ख रूह हो गई

चार हर्फ चांदी से मेहर
 के किसको दिखला रही हूँ

सौगात मिली चाँद रात
चाँद अब ना रहेगा साथ

खुद से खुद की अना को
"अरु" बतला रही हूँ

आराधना राय "अरु"

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"