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मुमकिन नहीं है


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तुम्हे भूल जाऊँ मुमकिन नहीं है
चलो इस जहां को ही भूल जाऊँ

फसाने हजारों मिलेगे तुम्हे भी
हमारी गली से तूम राब्ता रखना

भूल गर जाऊँ नगमे तुम्हारे हमारे
चाँद को तूम दो पल याद कर लेना

वफ़ा कीना पूछे, पूछे गम ए दिल
मेरा मोहताज़ तू कब हो गया था

वो मायूसी तेरी कामयाबी किसी की
दिल इतना बेईमान कब हो गया था

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आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

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