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वक्त लधुकथा

               
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तीनों ने समान बंधा और अपने अपने गंतव्य स्थल पर पहुँच कर एक दुसरे को लिखा, सफर अच्छा रहा ना में पटरी से उतरी ना लुटी गई..... ...
दूसरी ने लिखा अच्छा रहा ना किसी ने बम लगाया ना हिंदी इंग्लिश मराठी के नाम पर तोड़ा
तीसरी ने लिखा बेटे सब ठीक रहा पर आज मेरा आखरी दिन था किसी ने नही बताया और मेरी जगह किसी और को दे कर कहा सुखी रहो........................अभी जंग नहीं लगा इसलिए संग्रहालय में जा रही हूँ।

आराधना राय अरु

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"