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ज़माने बदल गए



साभार गुगल

मेरे तेरे अब वो ज़माने बदल गए
लोगों के आजकल फसाने बदल गए
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बदहालियों के जुर्म से कैसे निकल गए
रोजी की दौड़ में कितने तराने बदल गए
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आँखों में जाने कितने शरारे मचल गए
ए- आसमां तेरे सारे नज़ारे बदल गए
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ज़मघट लगा कर लोग कितने निकल गए
मिलने मिलाने में कितने ज़माने बदल गए
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रोशनी को देख कर परवाने जल गए
उम्मीद के गाँव से दीवाने बदल गए
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फाका परस्ती में जितने दिन निकल गए
वक़्त के धारे में कितने चेहरे बदल गए
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आसमां के नाम पर "अरु" सितारे बदल गए
गुम चाँदनी हो गई झिलमिल नजारे बदल गए
आराधना राय "अरु"

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"