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रंज़

   


रंज़ मेरा था मेरा, मेरे ही साथ रहा
उम्र भर आह कि वो ही सौगात रहा

दफ़न हो गए होते हम यूँ यहीं कहीं
अब के ज़माना भी मेरे ही साथ रहा

वो कहे रात तो रात ही बस मेरी सही
गमों का सौदा था हमनें  हँस के सहा

जानें कौन बिज़लियाँ रोज़  गिराता रहा
 ज़मी पे "अरु"अजब सा कुफ़्र ढाता रहा
आराधना राय "अरु "
Rai Aradhana ©
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कुफ़्र =attitude of ingratitude and thanklessness मतलबी ,ज़िस पर ईश्वर कि  कृपा ना हो 
                                   











                                      

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))