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नज़्म -जंग सरहदों की

नज़्म -जंग सरहदों की 
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ज़ख़्म एक माँ ने भी खाया होगा 
दिल उसका भी तो टूटा  ही होगा 
बाप कि रूह भी कांप गई यू होगी 
कंधो पे जब बेटे को उठाया होगा 
किसी के सपने मरे सरहद पे कहीं
कहीं तो  आँख में आँसू आया होगा
शहीद  कह कर ही पुकारेगा ज़माना 
आसमां में कहीं वो मुस्कुराया होगा  
गोलियाँ चलती रहेंगी  सरहदों पे यू 
कोई उनका भी निशाना बनता होगा 
जंग कि कैफ़ियत नहीं होती है कहीं 
जो चलाई गई साध कर ही निशाना 
ऐसी गोलियों का धर्म होता है कहीं 
नहीं ये जानती है हिन्दू , मुसलमान 
इनकी भी सरहदे होती है क्या कहीं 
करुँ किस बात का ज़िक्र तुझसे "अरु "
जंग कैसी भी हो  कोई बेहतरी नहीं होती 
 आराधना राय 
 Rai Aradhana ©

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आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

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