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चुभन





सलीक़े  से उठे बैठे बुज़ुर्गो की ये सब  हिदायत थी
करीने से संभाले घर माँ की उम्र भर ये ताक़ीदें  थी

नज़रों  को झुका ही घर से वो बाहर ही निकली थी
कोई शीशा था चुभा ऐसा की मेरी जां ही निकली थी

लबों पे मुस्कराहट ऐसी कि दिलों को बहलाती थी
बड़ी ही कैफियत दे कर ख़ुद को सम्हाल लेती थी

न जाने क्यों गुलिस्तां को फिर किसी ने उजाड़ा था
माँ के आंसुओ  ने रो कर दिल को फिर सम्हाला था

ना मालूम क्यूँ  माशरा ये  दुख्तर को ही यूँ रुलाता है
लड़कों को माशरा "अरु " कब  ये सबक़ सिखलाता है
आराधना राय "अरु"
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माशरा- society , समाज़ 

दुख्तर - girl  , लड़की 

चुभन 

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))