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सखी मित्र




     

       सखी ,मित्र
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 सुधियों के आँगन में मुस्कुराता है
 गीत सा कोई यू ही गुनगुनाता है

 उर में जो वह बसा कब का  हुआ है
मेरे संग ही तो वह प्रतिपल रहा  है

सखी तुम्हारी स्मृति सा वह यू तो है
प्रेम तुम्हारा उसमें ही अब साकार है

स्वपन का कोई वो नया सा आकाश है
ना जाने किस रीत का वह ही आधार है

प्रणय -सिंधु सा है वो ही अचल हुआ है
प्रीत कि धरोहर हिय में ही सजल हुआ है

मित्रता के क्षितिज पे वह हर्षित हुआ है
"अरु "नयनों में वो ही तो छाया हुआ है
आराधना राय
 Rai Aradhana ©






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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में लग गई आग सारे जमाने में लगेगी सदिया रूठो को मानने में अजब सी बात है ये दिल के फसाने में उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में आराधना राय 

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"