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नारायणी



अटल विश्वास के लिए साथ  खड़ी हूँ मैं
अपने सत्य से भी यू कहीं परे हूँ क्या मैं
स्वाधीन, मुक्त हूँ प्रश्न का उत्तर हूँ मैं
धरती धरणी धीर सी अम्बर कथा हूँ मैं
वीरकण से बनी धीर प्रतिमूर्ति ही  हूँ मैं

मौन मूक वेदना कि ये एक कड़ी  हूँ  मैं
अटल हूँ सजगता  से खड़ी हुई तो  हूँ मैं
जन्मों तुझ से कहीं यू जुड़ी ही रही हूँ मैं
सृष्टि कि अनमोल रचना भी रही हूँ मैं
दुष्ट भंजनी  बाहुबल , नारायणी  हूँ मैं
जीवन दायनी प्रबला मुक्तेश्वरी   हूँ  मैं
अनेक रूपा "अरु" स्वरूपा भी तो  हूँ मैं
आराधना राय
copyright : Rai Aradhana ©


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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))