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दुःख




 दुःख
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तुम से बात ना हो पाने का दुःख
ना जाने कैसे सह गई
तुम्हारे सपनों को बिसर जाने का दुःख
मौन हो सह गई ,
ना जाने कहाँ किस मोड़ पर ज़िंदगी
तेरे लिए ही रह गई
हादिसे दरकिनार करती गई ज़िंदगी
और में दरिया सी बह गई
"अरु" तेरे बगैर कुछ भी कहीं ना थी
सोचती हूँ ना जाने कैसे जी गई
आराधना राय


copyright : Rai Aradhana ©

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"