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नहीं जानती


नहीं जानती
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किस रूप में जन्म लूँगी फिर यह  नहीं जानती
हिंदू -मुस्लिम -ईसाई -सिख यह नहीं जानती


मेरा -तेरा करने वाले कब थमेंगे नहीं जानती
इंसान हूँ ईश्वर को हर रूप में ही हूँ बस मानती


कब छीटा कशी छोड़ेगा इंसान ये नहीं जानती
औरों के मान को कोई ना डसेगा नहीं जानती


किसी धर्म के नाम पर दंगा फिर होगा हूँ जानती
इस बार कोई एक इंसान मरेगा इतना हूँ जानती

आराधना  राय 


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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))