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दे दिए




ज़िंदगी के दीये यू ही जला दिए 
राह आसान ना थी रास्तों में घर बना दिए। 

तेरी बात को गले यू ही लगा लिए
कौन था जिसने हर बार गहरे ज़ख़्म लगा दिए 

करूँ क्या उन से में यू ही तौबा
जिन्होंने दूसरों के घर यू ही सरेआम जला दिए 

 जाने  तुम क्यों ना सम्हल पाए 
अपनी तमन्नाओं के लिए  दूसरों के दामन जला दिए  

ज़माने ने  सौ दाग़ मुझे ही दिए
कई चराग़ जलने से पहले ही  खुद खुदा बन बुझा दिए  

हालत पर बात यू ही बना दिए
वक़्त ने मेरी आँख में "अरु"  आँसू यू ही क्यों दे दिए 

आराधना राय 
  







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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))