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पीड सी



पात पात पर इठलाती प्रहरी
भोर हो कोई सुनहरी

तुम भोर हो पहली किरण कि
और मैं ढलती साँझ सी

कर रही नव किसलय स्वादन
प्रथम रंगिणी विभोर सी

मैं सूर्ये नहीं ना  हूँ रत्नाकर
हूँ सूर्ये कि पीड सी
                                                                                                                                                                  तिमिर को सह कर  ह्रदय में
चंद्र कि विभा सी

 मिटा कर आलोक में स्वयं को
 बनी  नव गीत सी

तुम जीवन के प्रयाण का प्राण
मैं अंत हूँ सुरभि सी

छेड़ती है राग-प्रेम बन  "अरु" का
 मानों ह्रदय कि टीस सी
आराधना राय













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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))