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बाबूल




बाबूल
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बचपन में तेरी उंगली को जब यू थाम चली थी
डगर उसी दिन से ये लंबी पहचान ही चली थी
तेरी बाहों में आ कर देखा ये पूरा ही संसार मैंने
बाबूल तेरे आँगन कि वो ही नन्हीं सी कली थी
तेरी बातों ने मेरी जुंबा को नए से शब्द ही दिए थे
जीवन से पहचान उसी दिन ही जा कर तो हुई थी
तेरे बिन अश्रु धारा कितनी यहॉ यू बहा कर चली हूँ
बगैर धुप का पौधा ही हूँ पेड़ मैं कब बन ही सकी हूँ
तेरी हर बात को आज भी मन में यू बसाए हुए हूँ
कठिन से जीवन कि डोर "अरु " ये भी थाम चली हूँ
आराधना राय

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))