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राज़

         
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चले जो बच के साहिलों से उसमें भी तो कुछ है
लहरों से बच कर कश्ती चली उसमे भी कुछ है

आषाढ़ कि बारिश यू ही लगे सावन कि झंकार है
उसकी बात नहीं कोई यू ही बेबात उसमें  कुछ है

मंज़िले अपना जब रास्ता खुद ही कहीं यू ढूँढती है
दिल तो रोया आँख में आसूँ ना आए उसमें कुछ है

बादल तो बरसे खूब पर तुम नहीं क्यू नही तुम आए
उस में जो बात है "अरु"उसमें भी राज़ भी तो कुछ है
आराधना राय


copyright : Rai Aradhana ©

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"